सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पोस्ट संबंधी प्राथमिकी पर हाईकोर्ट के दिशा-निर्देशों को बरकरार रखा

नयी दिल्ली, 05 फरवरी (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़े मामले में प्राथमिकी दर्ज करने को विनियमित करने संबंधी तेलंगाना उच्च न्यायालय के बनाये दिशा-निर्देशों को सही ठहराया है।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की एक पीठ ने गुरूवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए तेलंगाना राज्य की दायर विशेष अनुमति याचिकाओं के एक बैच को खारिज कर दिया है। इन याचिकाओं में उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गयी थी। इस फैसले में तीन प्राथमिकी रद्द कर दी गयी थी और सोशल मीडिया सामग्री पर आधारित आपराधिक कार्यवाहियों से निपटते समय पुलिस और न्यायिक मजिस्ट्रेटों के लिए विस्तृत परिचालन दिशा-निर्देश निर्धारित किये थे।
इस चुनौती याचिका में दखल देने से मना करते हुए न्यायालय ने कहा कि उसने गाइडलाइंस की 'बारीकी' से जांच की है और उन्हें बदलने का कोई कारण नहीं मिला। पीठ ने कहा, "हमने पैरा 29 की पूरी जांच की है। हमारा मानना है कि हमें उच्च न्यायालय के फैसले और आदेश में दखल नहीं देना चाहिए। इसमें उच्च न्यायालय का जारी दिशा-निर्देश भी शामिल हैं।"
अपने आदेश में तेलंगाना उच्च न्यायालय ने नल्ला बालू के खिलाफ कांग्रेस पार्टी की आलोचना करने वाली उनकी एक्स पर की गयी पोस्ट के खिलाफ दर्ज तीन प्राथमिकी रद्द कर दी। उच्च न्यायालय ने यह माना था कि पोस्ट हालांकि आलोचनात्मक थे, लेकिन वे वैध राजनीतिक अभिव्यक्ति के दायरे में आते थे। इसके अलावा शिकायतों में विशिष्ट विवरणों की कमी थी और शिकायतकर्ताओं के पास इस मामले में हस्तक्षेप या शिकायत दर्ज करने के कानूनी अधिकार का अभाव था।
न्यायालय ने पाया कि आपराधिक कार्यवाही का जारी रहना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। न्यायालय ने यह व्यवस्था दी कि शत्रुता को बढ़ावा देने, सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा या राजद्रोह जैसे अपराधों के लिए प्राथमिकी केवल तभी दर्ज की जा सकती है, जब प्रथम दृष्टया ऐसा मामला बनता हो जिससे हिंसा, नफरत या सार्वजनिक अव्यवस्था फैलाने के लिए उकसावे का पता चलता हो।
उच्च न्यायालय के जारी किये गये परिचालन दिशा-निर्देशों में मानहानि या इसी तरह के अपराधों के लिए प्राथमिकी दर्ज करने से पहले सुनवाई के अधिकार का सत्यापन, संज्ञेय मामलों में वैधानिक तत्वों की पुष्टि करने के लिए प्रारंभिक जांच का संचालन और राजनीतिक भाषण से जुड़े मामलों में एक उच्च सीमा का अनुप्रयोग शामिल है, जो केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य और श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ में निर्धारित सिद्धांतों के अनुरूप है।
दिशा-निर्देशों में अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य में निर्धारित गिरफ्तारी सुरक्षा उपायों का सख्त अनुपालन, संवेदनशील मामलों में सरकारी अभियोजक से पूर्व कानूनी राय और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 176(1) के तहत बेतुकी या राजनीति से प्रेरित शिकायतों को बंद करना अनिवार्य किया गया है।
उच्चतम न्यायालय में तेलंगाना राज्य की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने प्राथमिकी रद्द करने को चुनौती नहीं दी, लेकिन दिशा-निर्देशों के दायरे पर आपत्ति जतायी और कहा कि वे एक जैसी नहीं हैं। उनमें सुधार की जरूरत है। उच्चतम न्यायालय ने हालांकि इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि वह उच्च न्यायालय के दिये गये निर्णय या तैयार किये गये दिशा-निर्देशों में हस्तक्षेप का इच्छुक नहीं है।

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