उच्चतम न्यायालय के लिए कई महत्वपूर्ण फैसलों का साल रहा 2025

उच्चतम न्यायालय के लिए कई महत्वपूर्ण फैसलों का साल रहा 2025

नयी दिल्ली, 30 दिसंबर (वार्ता) उच्चतम न्यायालय के कुछ ऐतिहासिक फैसलों के साथ वर्ष 2025 का समापन हुआ। इनमें अरावली की परिभाषा तय करना और अधिकारियों को दिल्ली में बीएस-4 मानकों से नीचे के वाहनों को जब्त करने की छूट देना शामिल है।


दूसरी ओर विधि मंत्रालय ने लगभग 50 पुराने कानूनों को इतिहास के पन्नों में समेट दिया, जिससे रोज़मर्रा का कानूनी प्रशासन और सरल तथा जन-केंद्रित हुआ। मंत्रालय ने वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्रों (एडीआर) को तेज़ करके लंबित मामलों को कम करने के भी सराहनीय प्रयास किये।


 मंत्रालय ने इस साल न्यायपालिका के प्रति उदार रुख अपनाते हुए खुद सरकार द्वारा दायर किये गये बड़ी संख्या में लंबित मामलों को वापस ले लिया। ज्ञात हो कि अदालतों में सरकार सबसे बड़ी वादी है।


 अरावली के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने पर्यावरणविदों की उस चिंता पर ध्यान दिया जिसमें आरोप लगाया गया था कि सरकार ने चतुराई से नियमों में बदलाव किया है ताकि खनन कंपनियां इस पर्वत श्रृंखला में खनन कर सकें। न्यायालय ने अपने पुराने आदेश को पलट दिया जिसमें पिछली समिति की रिपोर्ट को स्वीकार किया गया था और इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को वैसी पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता नहीं है जैसी उच्च पहाड़ियों को है। न्यायालय ने इस विषय पर विशेषज्ञों की अपनी एक नयी समिति बनाने का निर्देश दिया है।


 प्रदूषण की मार झेल रहे दिल्लीवासियों की नाराजगी और बेबसी के बीच, चौतरफा आलोचनाओं का सामना कर रही दिल्ली सरकार ने उच्चतम न्यायालय से गुहार लगाई कि बीएस-4 से पुराने वाहनों पर की जाने वाली कार्रवाई पर लगी रोक हटायी जाए। न्यायालय ने इसकी अनुमति दे दी।


इसी तरह के एक मामले में, उच्चतम न्यायालय ने पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से परहेज किया, लेकिन दिवाली पर निर्धारित घंटों के दौरान प्रमाणित 'ग्रीन पटाखों' के सीमित उपयोग की अनुमति दी।


 कुख्यात निठारी कांड में एक और नया मोड़ आया जब उच्चतम न्यायालय ने मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली को हत्या और कथित तौर पर बच्चों का मांस खाने के आरोप के मामले में किसी विश्वसनीय साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। इससे पहले सह-आरोपी मोनिंदर पंढेर को भी बरी कर दिया गया था।


 कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका का एक पेचीदा मामला भी इस वर्ष उच्चतम न्यायालय के सामने आया। इसमें मुख्य मुद्दा यह था कि क्या न्यायालय किसी राज्यपाल को किसी विधेयक (बिल) पर निर्णय लेने का आदेश दे सकती है, जिसे राज्यपाल ने अपने विवेक से रोक कर रखा हो। इस मामले में अनुच्छेद 200 और 201 पर 'राष्ट्रपति संदर्भ' के माध्यम से भी राय मांगी गई थी।


 राष्ट्रपति यह जानना चाहते थे कि क्या अदालतें राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिये विधेयक पर अपनी सहमति देने की समय-सीमा तय कर सकती हैं। न्यायालय ने फैसला सुनाया कि संवैधानिक अधिकारियों को उचित रूप से कार्य करना चाहिए, लेकिन अदालतें उन पर समय-सीमा नहीं थोप सकतीं। न्यायालय ने हालांकि ने यह भी कहा कि राज्यपाल के पास 'पूर्ण वीटो' की शक्ति नहीं है और वे अनिश्चितकाल तक विधेयकों को रोक कर नहीं रख सकते। यह फैसला शक्तियों के पृथक्करण और संवैधानिक संतुलन की पुष्टि करता है।


 आवारा कुत्तों के काटने और हमले के शिकार पीड़ितों के परिवारों और पशु प्रेमियों के बीच चल रही कानूनी जंग भी उच्चतम न्यायालय पहुंची। न्यायालय ने स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक स्थानों पर होने वाले आवारा कुत्तों के हमलों पर चिंता जतायी। न्यायालय ने आवारा कुत्तों को शिविरों में स्थानांतरित करने के साथ-साथ उनके नसबंदी और टीकाकरण के निर्देश दिए। जब न्यायालय ने पशु प्रेमियों से पूछा कि यदि वे इतने चिंतित हैं तो वे इन कुत्तों को गोद क्यों नहीं ले लेते, तो पशु प्रेमी रक्षात्मक मुद्रा में नजर आए।


 वक्फ बोर्ड से संबंधित मामले में, वक्फ संशोधन अधिनियम, 2025 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी, जिसमें धार्मिक बंदोबस्ती पर अत्यधिक सरकारी नियंत्रण का आरोप लगाया गया था। उच्चतम न्यायालय ने अधिनियम के कुछ चुनिंदा प्रावधानों पर रोक लगा दी, जबकि शेष अधिनियम को बहाल कर दिया।


 वर्ष 2025 में विधि और न्याय मंत्रालय ने कुछ दूरगामी निर्णय लिए, जिससे आम आदमी के लिए न्याय तक पहुंच आसान हुई। मंत्रालय ने सरकारी विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों से जुड़े लंबित मामलों की बड़े पैमाने पर समीक्षा शुरू की, ताकि सरकार की 'सबसे बड़े वादी' वाली छवि को कम किया जा सके। इसके अलावा, अदालतों का बोझ कम करने के लिए देश भर में लोक अदालतों का आयोजन किया गया।


संसद में मंत्रालय ने कई अप्रचलित और व्यर्थ कानूनों को निरस्त करने के लिए कानून पारित करवाया, जिससे न्यायिक समय की बचत हुई। औपनिवेशिक काल के कानूनों को हटाने और कानूनी ढांचे को सरल बनाने के इस कदम की न्यायपालिका के साथ-साथ वादियों ने भी सराहना की।


 मंत्रालय ने 'सबका बीमा सबकी रक्षा अधिनियम' के माध्यम से बीमा कानून में सुधार किए, जिससे बीमा क्षेत्र में उच्च विदेशी निवेश की अनुमति मिली और नियामक निगरानी मजबूत हुई। सरकार ने वर्ष के अंत में परमाणु ऊर्जा विनियमन, सुरक्षा और दायित्व से संबंधित एक व्यापक कानून पारित करके ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्यों के अनुरूप भारत के परमाणु कानूनी ढांचे को अद्यतन बनाया।


 


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