बुद्ध पूर्णिमा: माइक्रो मून/फ्लावर मून 2026, 1 मई 2026 को, क्यों दिखाई देगा छोटा चन्द्रमा ?


खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि मई में आसमान में एक नहीं बल्कि एक ही महीने में दो बार पूर्णिमाओं को देखा जा सकेगा, पहली होगी वैशाख पूर्णिमा, जिसे बुद्ध पूर्णिमा भी कहा जाता है, इस बार 1 मई 2026 को मनाई जाएगी, साथ ही मई 2026 में हमें 1 मई 2026 की रात्रि को बुद्ध पूर्णिमा पर एक पूर्णिमा देखने को मिलेगी जो कि माइक्रो मून/फ्लावर मून होगी जिसका चांद सुपर मून के मुकाबले लगभग 15 प्रतिशत छोटा नज़र आयेगा और मई माह के अंत में दूसरी पूर्णिमा घटित होगी जोकि ब्लू मून कहलाएगी। इसीलिए आपको इस बार वर्ष 2026 में एक ही मई महीने में दो पूर्णिमाएँ देखने को मिलेंगी, जिनमें से दूसरी पूर्णिमा को ब्लू मून कहा जाएगा। 

कहावत है कि "वन्स इन अ ब्लू मून" (कभी-कभी होने वाली घटना), जिसका अर्थ है कि यह बहुत दुर्लभ है, लेकिन क्या सच में ऐसा होगा?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पूर्णिमा, चंद्रमा की सबसे आकर्षक खगोलीय अवस्थाओं में से एक है ,जब चंद्रमा का लगभग पूरा चेहरा प्रकाशित होता है और हमें पृथ्वी से दिखाई देता है। पूर्णिमा के दिन, हम चंद्रमा के लगभग पूरे प्रकाशित भाग को देख पाते हैं क्योंकि सूर्य और चंद्रमा, पृथ्वी के विपरीत दिशाओं में लगभग एक सीध में आ जाते हैं। 


कब होगा बुद्ध पूर्णिमा का माइक्रो फ्लावर मून?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि बुद्ध पूर्णिमा पर माइक्रो फ्लावर मून का दीदार होगा जोकि 1 मई 2026, को घटित होगा और इसका चरम समय रात्रि 10:53 PM पर होगा, लेकिन साथ ही पूर्णिमा का समय अलग-अलग समय क्षेत्र के अनुसार भिन्न हो सकता है। परंतु उपरोक्त समय और तिथि भारतीय समयानुसार हैं।

पूर्णिमा कब घटित होती है?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पूर्णिमा वह समय होता है जब सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी के विपरीत दिशाओं में एक सीध में होते हैं, जिसे खगोल विज्ञान की भाषा में' सिज़ीगी' कहते हैं,और चंद्रमा का लगभग 100% भाग सूर्य द्वारा प्रकाशित होता है, उस समय, चंद्रमा का प्रकाशित भाग पृथ्वी की ओर होता है जबकि दूसरा भाग अंधकार में होता है। अमावस्या के समय इसका ठीक विपरीत होता है।लेकिन साथ ही चंद्रमा भी पृथ्वी के चारों ओर निरंतर गतिमान रहता है, इसलिए तकनीकी रूप से कहें तो पूर्णिमा केवल एक क्षण के लिए ही घटित होती है या कुछ यूं कहें कि इसका अर्थ यह होता है कि पृथ्वी के कुछ हिस्सों में पूर्णिमा का सटीक समय दिन के दौरान भी हो सकता है। या रात्रि के दौरान भी। लेकिन जैसा कि हम जानते हैं कि चंद्रमा हमारी पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है और जब चंद्रमा की डिस्क का लगभग 98% से अधिक भाग प्रकाशित होता है, तो चंद्रमा एक दिन पहले या बाद में भी पूर्ण चंद्र जैसा ही दिखाई दे सकता है। इसीलिए कभी कभी आम जनमानस को साधारण आँखों से देखने पर पूर्णिमा और बढ़ते चंद्रमा के अंतिम चरण या घटते चंद्रमा की शुरुआत के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि चन्द्रमा हमेशा लगभग 100% प्रकाशित नहीं होता है,पृथ्वी से देखने पर कुछ पूर्णिमाएँ थोड़ी कम प्रकाशित दिखाई देती हैं । कुछ पूर्णिमाओं के दौरान चंद्रमा का पूरा प्रकाशित गोलार्ध दिखाई न देने का कारण यह है कि पृथ्वी के चारों ओर चंद्रमा की कक्षा पृथ्वी के कक्षीय तल, क्रांतिवृत्त के सापेक्ष लगभग 5° डिग्री के कोण पर झुकी हुई है,यदि पूर्णिमा उस समय होती है जब चंद्रमा क्रांतिवृत्त के ऊपर या नीचे होता है, तो हम चंद्रमा को एक ऐसे कोण से देखते हैं जिससे प्रकाश का प्रतिशत थोड़ी मात्रा में कम हो जाता है। 

क्या होता है सुपरमून और माइक्रोमून? 

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह बुद्ध पूर्णिमा जो 1 मई 2026 की रात्रि में घटित होगी उसका मून एक माइक्रोमून है , जिसका अर्थ है कि यह अपोजी के साथ मेल खाता है,जो चंद्रमा की कक्षा में पृथ्वी से सबसे दूर का बिंदु होता है। अगर हम बात करें सुपरमून और माइक्रोमून की तो पाते हैं कि कुछ पूर्णिमाओं को सुपरमून कहा जाता है, जबकि अन्य को माइक्रोमून, इसका संबंध पूर्णिमा के दौरान पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी से है। 

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि चंद्रमा की कक्षा का वह बिंदु जो पृथ्वी के सबसे निकट होता है, उसे पेरिजी कहा जाता है, और वह बिंदु जो सबसे दूर होता है, उसे अपोजी के नाम से जाना जाता है। जब पूर्णिमा का चंद्रमा पेरिगी के करीब होता है, तो वह आकाश में थोड़ा बड़ा दिखाई देता है और इसे सुपरमून या सुपर फुल मून भी कहा जाता है। लेकिन जब पूर्णिमा का चंद्रमा एपोगी के करीब होता है, तो वह थोड़ा छोटा दिखाई देता है और इसे ही माइक्रोमून कहा जाता है।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि मई 2026 में, भारत में दो सूक्ष्म चंद्रमा (माइक्रो मून) की घटनाएं होंगी, जिनमें पूर्णिमा पृथ्वी से अपने सबसे दूर के बिंदु (अपोजी) पर होगी, जिससे यह छोटा और कम चमकीला दिखाई देगा। पहली घटना 1 मई, 2026 को फ्लावर माइक्रोमून की होगी, जिसके बाद 31 मई, 2026 को एक दुर्लभ ब्लू माइक्रोमून दिखाई देगा, पहला माइक्रोमून जो बुद्ध पूर्णिमा पर घटित होगा ( जिसको फ्लावर मून या फूलों वाला चंद्रमा) भी कहा जाता है यह 1 मई, 2026 को होगा, और दूसरा सूक्ष्म चंद्रमा (माइक्रो मून) जिसे (ब्लू मून) कहा जायेगा यह महीने के अंत में होगा,और यह भारत में 30-31 मई की रात को दिखाई देगा। यह माइक्रो मून की चंद्र घटना तब घटित होती है जब पूर्णिमा अपने सबसे दूर के स्थान पर होती है,जो सुपरमून के विपरीत है। और 31 मई का चंद्र 2026 का सबसे दूर का चंद्र होगा।

कैसे होगा मई के अंत में ब्लू मून?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस महीने, दूसरी पूर्णिमा का चांद जो मई के अंत में घटित होगा,इसे ब्लू मून कहा जायेगा। आमतौर पर हर महीने एक पूर्णिमा होती है, लेकिन कभी-कभी जब एक ही कैलेंडर वर्ष में दो भी हो जाती हैं तो इस दूसरी पूर्णिमा को ब्लू मून इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह कैलेंडर माह में एक अतिरिक्त पूर्णिमा है और इसका बाकी पूर्णिमाओं की तरह कोई विशिष्ट नाम नहीं है। लगभग दो वर्षों में यह पहला ब्लू मून है। "वन्स इन अ ब्लू मून" मुहावरे का अर्थ भी किसी ऐसी घटना से है जो बहुत ही दुर्लभ रूप से घटित होती है,खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि दिलचस्प बात यह है कि ब्लू मून उतना दुर्लभ नहीं है जितना कि प्रचलित कहावत से लगता है। ब्लू मून औसतन हर ढाई साल में एक बार घटित होता है। लेकिन इसका ब्लू रंग से कोई भी लेना देना नहीं होता है यह इस एक ही माह में दूसरी पूर्णिमा को केवल एक नाम भर दिया जाता है। जिसे ही ब्लू मून कहा जायेगा।

एक वर्ष में कितनी पूर्णिमाएँ होती हैं?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अधिकांश वर्षों में बारह पूर्णिमाएँ होती हैं, यानी हर महीने एक। हालाँकि, हमारा कैलेंडर खगोलीय घटनाओं के साथ पूरी तरह से मेल नहीं खाता है । इसलिए, कभी-कभी किसी वर्ष में तेरह पूर्णिमाएँ भी हो जाती हैं । जब ऐसा होता है, तो उन 13 पूर्णिमाओं में से कम से कम एक को ब्लू मून कहा जाता है ।


क्या-क्या होते हैं,12 पूर्णिमाओं के अलग अलग 12 महीनों में नाम? 

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि कुछ इस प्रकार होते हैं 12 अलग-अलग पूर्णिमाओं के नाम।


माह     पूर्णिमा के चांद का नाम 


जनवरी               वुल्फ मून


फरवरी                स्नो मून


मार्च                    बर्म मून 


अप्रैल                 पिंक मून 


मई     फ्लावर मून/माइक्रो मून 


जून            स्ट्रॉबेरी मून


जुलाई          बक मून 


अगस्त            स्टर्जन मून 


सितंबर            कॉर्न मून 


अक्तूबर               हंटर मून


नवंबर                बीवर मून


दिसंबर                कोल्ड मून


(इसके अलावा,13 पूर्णिमा वाले वर्ष में एक ब्लू मून भी दिखाई देगा,जोकि आगामी 31 मई को दिखाई देगा)।

पृथ्वी से लगभग कितनी दूरी पर होगा फ्लॉवर मून/माइक्रो मून?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 1 मई 2026 का (फ्लॉवर मून / माइक्रो मून) इस समय चंद्रमा पृथ्वी से लगभग 401,999.9 किलोमीटर (249,791.7 मील) की दूरी पर होगा। और देखने पर यह यह एक माइक्रो मून होगा जोकि तुला राशि (Libra) में दिखाई देगा। जब पूर्णिमा के समय चंद्रमा अपनी कक्षा में पृथ्वी से सबसे दूर बिंदु, जिसे खगोल विज्ञान की भाषा में अपोजी (Apogee) कहते हैं, के पास होता है। इसके परिणामस्वरूप, चंद्रमा आकाश में थोड़ा छोटा दिखाई देता है, जिसका आभासी आकार लगभग 0.50° होता है।

 कैसे ख़ास घटित होती है माइक्रो मून की पूर्णिमा (Full Moon)? 

वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला (तारामण्डल) गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत के खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि माइक्रो मून/फ्लावर मून की पूर्णिमा तब होती है जब चंद्रमा का वह भाग, जो पृथ्वी की ओर है, सूर्य के प्रकाश से लगभग 100% प्रकाशित दिखाई देता है। यह स्थिति तब बनती है जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच में होती है, अर्थात चंद्रमा पृथ्वी के उस पार होता है जो सूर्य के विपरीत दिशा में है। आकाश में चंद्रमा के पथ (Trajectory) को इस ज्यामितीय स्थिति (जिसे विपरीत स्थिति (Opposition) कहा जाता है) के कारण पूर्णिमा का चंद्रमा सूर्यास्त के समय उदित होता है और लगभग आधी रात के आसपास सबसे ऊँचाई पर पहुंचता है एवं सूर्योदय के समय अस्त हो जाता है।

क्या होता है पूर्णिमा के बीच का अंतराल?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि दो पूर्णिमाओं के बीच का समय लगभग 29.53 दिन (29 दिन, 12 घंटे, 43 मिनट) होता है। इसे खगोल विज्ञान की भाषा में सिनोडिक महीना (Synodic Month) या ल्यूनेशन कहा जाता है।

यह एक औसत मान है,वास्तविक अंतर कुछ घंटों तक बदल सकता है,क्योंकि चंद्रमा की कक्षा पूर्णतः गोलाकार न होकर यह दीर्घवृत्ताकार होती है और पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर कक्षा भी दीर्घवृत्ताकार (elliptical) है

क्या होता है चंद्र लिब्रेशन/ हिलता हुआ चंद्रमा?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव से देखने पर चंद्रमा एक दीर्घवृत्ताकार पथ पर वामावर्त दिशा में पृथ्वी की परिक्रमा करता है,और चंद्रमा का एक ही भाग हमेशा पृथ्वी की ओर रहता है। पूर्णिमा के दौरान, चंद्रमा का यह निकटवर्ती भाग पूरी तरह से प्रकाशित होता है,जिससे हम चंद्रमा की सतह का आधा भाग देख पाते हैं ।

अमर पाल सिंह ने बताया लेकिन हम वास्तव में चंद्रमा की सतह का 59% हिस्सा देख सकते हैं,भले ही किसी भी समय केवल 50% ही दिखाई देता हो, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि चंद्रमा उत्तर से दक्षिण की ओर थोड़ा हिलता है और पूर्व से पश्चिम की ओर थोड़ा डगमगाता भी है, जिसे खगोल वैज्ञानिक भाषा में चंद्र लिब्रेशन कहते हैं ।

पूर्णिमा के दिन कब, क्यों और कैसे होते हैं उच्च ज्वार और निम्न ज्वार ?

वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला ( तारामण्डल) गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत के खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि उच्च ज्वार और निम्न ज्वार के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर पूर्णिमा और अमावस्या के आसपास होता है,चंद्रमा की इन अवस्थाओं के दौरान,चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल मिलकर समुद्र के जल को एक ही दिशा में खींचते हैं। इन ज्वारों को स्प्रिंग टाइड्स या किंग टाइड्स के नाम से भी जाना जाता है। और तीसरा प्राथमिक चंद्र चरण पूर्णिमा,चंद्रमा की चार प्रमुख अवस्थाओं में से तीसरी अवस्था है,जो समय के विशिष्ट क्षणों में घटित होती हैं। अन्य तीन अवस्थाएँ हैं अमावस्या , प्रथम चतुर्थांश और तृतीय चतुर्थांश,इसके अतिरिक्त, चंद्रमा की चार मध्यवर्ती अवस्थाएँ भी होती हैं जो मुख्य अवस्थाओं के बीच के समय को कवर करती हैं। ये हैं: बढ़ता हुआ अर्धचंद्र , बढ़ता हुआ गिबस चंद्रमा , घटता हुआ गिबस चंद्रमा और घटता हुआ अर्धचंद्र ।

पृथ्वी से देखने पर चंद्रमा की आठ कलाओं के चित्रण की बात करें तो पाते हैं कि जिसमे उनके प्रकट होने के क्रम को दर्शाता है। चंद्रमा की आठ अवस्थाओं को पूरा करने में लगभग 29.5 दिन लगते हैं।

पूर्ण चन्द्र का प्राचीन सांस्कृतिक और धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व क्या रहा है ?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि चंद्रमा, विशेषकर पूर्णिमा ने हजारों वर्षों से मानव संस्कृति को प्रभावित किया है। उदाहरण के लिए, ईस्टर रविवार की तिथि, वसंत विषुव और उसके बाद आने वाली पूर्णिमा की तिथियों के अनुमानों के आधार पर निर्धारित की जाती थीं। और इसी कारण आज भी, तमाम लोग पूर्णिमा के प्राचीन नामों का उपयोग करते हैं,जैसे कि हार्वेस्ट मून, स्ट्रॉबेरी मून , पिंक मून और ब्लू मून आदि। धार्मिक तौर पर देखें तो पाते हैं कि चंद्रमा ने अनगिनत देवी एवम् देवताओं को भी प्रेरित किया है, जैसे केवल पश्चिमी जगत की बात करें तो पाते हैं कि जैसे रोमन देवी लूना या उनके नॉर्स पुरुष समकक्ष , जिनके नाम पर सोमवार का नाम पड़ा आदि और कुछ लोगों द्वारा पहले यह भी माना जाता था कि चंद्रमा मानसिक बीमारी का कारण बनता है, इसीलिए इसे पागल कहा जाता था साथ ही पूर्णिमा को अलौकिक परिवर्तनों के लिए भी जिम्मेदार ठहराया जाता था,जो अन्यथा हानिरहित पुरुषों को खूंखार भेड़ियों में बदल देती थी । इसीलिए उस जमाने में पागल लोगों को लूनाटिक ( lunatic) या चांदमारा भी कहा जाता था। लेकिन आधुनिक खगोल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ओत प्रोत वैज्ञानिक अनुसंधानों से युक्त लगभग सभी लोग जान चुके हैं कि किसी भी आलौकिक जगत से चंद्रमा का कोई भी लेना देना नहीं होता है यह तो पृथ्वी का एकमात्र सुंदर प्राकृतिक उपग्रह है जो भौतिक नियमों का पालन करता है एवं अपने अति शांत छुपे हुए खगोलीय रहस्यों एवं विशेष भौतिकीय रूप से अनगिनत मायनों में पृथ्वी के लिए अति महत्त्वपूर्ण है ही इसीलिए अपने चांद को पहले ठीक से जानें उसके बाद में ही मानें, यही कारण है कि खगोलविद अमर पाल सिंह हमेशा ही कहते हैं कि  सही ज्ञान, सभी समस्याओं का समाधान और यही है विज्ञान। 

प्रत्येक पूर्णिमा को क्यों नहीं होता है चंद्र ग्रहण ?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पूर्णिमा को ही चंद्र ग्रहण भी घटित होता है लेकिन प्रत्येक पूर्णिमा को चंद्र ग्रहण नहीं होता है इसका कारण है कि 

साल में दो या तीन बार, पूर्णिमा का चरण,चंद्रमा के अपनी कक्षा के चंद्र नोड्स पर पहुंचने के साथ मेल खाता है। ये वे बिंदु हैं जहां चंद्रमा की कक्षा क्रांतिवृत्त को पार करती है,जो पृथ्वी से देखे जाने पर सूर्य का पथ है। ऐसा होने पर,और जब तीनों खगोलीय पिंड सटीक एक सीधी रेखा (180 डिग्री) पर आते हैं तभी पृथ्वी, पूर्णिमा के चंद्रमा पर अपनी छाया डालती है, जिससे चंद्र ग्रहण होता है, लेकिन चंद्रमा की कक्षा पृथ्वी के सापेक्ष 5 डिग्री झुकी हुई है जो हर बार सटीक एक सीधे रेखा में प्रत्येक पूर्णिमा में नहीं आती है इसीलिए हर पूर्णिमा को चंद्र ग्रहण नहीं होता है क्योंकि यह कभी थोड़ा सा ऊपर एवं कभी नीचे से गुज़र जाती है इसीलिए जब तीनों खगोलीय पिंड सटीक एक सीधे रेखा में आ जाते हैं उसी दौरान चंद्र ग्रहण होता है उस से पहले नहीं, दूसरी ओर, सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा अमावस्या के आसपास चंद्र नोड्स के करीब आता है।

कैसे और कितने बजे से कितने बजे तक देखें, माइक्रो मून/ फ्लावर मून को?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि माइक्रो मून (Micro moon) खगोल विज्ञान में एक खगोलीय घटना है। इसे पूरी तरह से समझने के लिए आपको चंद्रमा की कक्षा (orbit) और दूरी के परिवर्तन को समझना होगा। क्योंकि माइक्रो मून वह स्थिति है जब चंद्रमा ,पूर्णिमा (Full Moon) या अमावस्या (New Moon) के समय अपनी कक्षा में पृथ्वी से सबसे अधिक दूरी (Apogee / अपोजी) के पास होता है, इसी कारण चंद्रमा हमें आकार में थोड़ा छोटा और कम चमकीला भी दिखाई देता है। इसके पीछे पूरी तरह से खगोल वैज्ञानिक आधार है क्योंकि चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर पूर्ण वृत्ताकार नहीं बल्कि दीर्घवृत्त (elliptical orbit) में घूमता है। इस कक्षा में दो मुख्य बिंदु होते हैं पहला Perigee (पेरिजी) पृथ्वी के सबसे पास जो लगभग (363,300 किलोमीटर) और दूसरा होता है Apogee (अपोजी) जोकि पृथ्वी से सबसे दूर ( लगभग 405,500 किलोमीटर), जब पूर्णिमा (Full Moon) और Apogee (पृथ्वी से सबसे दूर बिंदु) एक साथ होते हैं तभी माइक्रो मून (Micro moon) की घटना घटित होती है जिस कारण से माइक्रो मून का पूर्ण चंद्रमा, ख़ासकर सुपर मून की पूर्णिमा की तुलना में लगभग 12 से 14 प्रतिशत छोटा दिखाई देता है एवं लगभग 25 से 30 प्रतिशत कम चमकीला होता है साथ ही माइक्रो मून का मैग्नीट्यूड लगभग माइनस 12.5 के क़रीब होता है, इसीलिए यह सुपर मून की पूर्णिमा (Full Moon) से थोड़ा कम चमकीला होता है , लेकिन यह अंतर बहुत सूक्ष्म होता है इसको आम आँखों से तुरंत पहचानना मुश्किल होता है। लेकिन इस माइक्रो मून/फ्लावर मून को देखने के लिए आपको किसी ख़ास खगोलीय उपकरण की आवश्यकता नहीं है,आप अपनी साधारण आंखों से ही इस शानदार चांद का दीदार कर सकते हैं,क्योंकि 1 मई 2026 को माइक्रो मून,शाम लगभग 6 बजकर 30 मिनट के क़रीब क्षितिज के ऊपर आना शुरू कर देगा जोकि पूर्वी आकाश में थोड़ा सा दक्षिण की ओर दिखाई देना शुरू करेगा इसके बाद से आप इसका लुत्फ़ उठा सकते हैं और पूरी रात्रि से लेकर भोर तक आकाश में दिखाई देगा। लेकिन अगर आपके पास कोई छोटी टेलीस्कोप/दूरबीन या विनोकुलर एवं कैमरा आदि है तब आप इसके और भी शानदार रूप के साथ ही चन्द्रमा के क्रेटरों को भी आसानी से देख सकते हैं। 

क्या पृथ्वी पर माइक्रो मून का कोई प्रभाव पड़ता है ?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोल वैज्ञानिक रूप से ज्वार-भाटा (ebb and Tides) पर हल्का प्रभाव कम होता है कोई खतरनाक या विशेष प्रभाव नहीं होता है। यह केवल एक दृश्य (visual) खगोलीय घटना है, यह कोई आपदा नहीं है।

माइक्रो मून कितनी बार होता है ?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि एक वर्ष में 1 से 3 बार माइक्रो मून हो सकता है , लेकिन हर बार (Full Moon) पूर्णिमा या अमावस्या (New Moon) के साथ संयोग (coincide) होना जरूरी है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि माइक्रो मून एक खगोलीय घटना है जिसमें चंद्रमा,पृथ्वी से दूर होता है और 

थोड़ा छोटा और कम चमकीला दिखता है और इसका कारण पूरी तरह गुरुत्वाकर्षण और कक्षीय यांत्रिकी (orbital mechanics) आदि में निहित होता है। और यही है माइक्रो मून की महत्वपूर्ण पूर्णिमा।

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