भारत के जनजागरण का उत्सव है हिन्दी पत्रकारिता की 200वीं सालगिरह
नयी दिल्ली, 30 मई (वार्ता) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिन्दी पत्रकारिता की द्विशताब्दी को भारत की चेतना, विचार और जनजागरण का उत्सव बताते हुए कहा कि वर्ष 1826 में 'उदन्त मार्त्तण्ड' के प्रकाशन से शुरू हुई हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा देश की सांस्कृतिक और वैचारिक धारा को सशक्त बनाने वाली रही है।हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में संस्कृति मंत्रालय के स्वायत्त संस्थान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) और माधवराव सपरे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय समारोह में हिन्दी के प्रथम समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड और उसके संपादक युगल किशोर शुक्ला के सम्मान में स्मारक डाक टिकट तथा प्रथम दिवस आवरण जारी किया गया।
कार्यक्रम में प्रधानमंत्री का संदेश आईजीएनसीए के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने पढ़कर सुनाया। श्री मोदी ने संदेश में कहा, "वर्ष 1826 में 'उदन्त मार्त्तण्ड' के प्रकाशन के साथ आरंभ हुई हिन्दी पत्रकारिता की द्विशताब्दी की यात्रा का यह अहम पड़ाव भारत की चेतना, विचार और जनजागरण का उत्सव है।"
समारोह के मुख्य अतिथि एवं केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने स्मारक डाक टिकट जारी करते हुए कहा कि पत्रकारिता के इतिहास की गाथा भारत के इतिहास की भी गाथा है। उन्होंने कहा, "आज का आयोजन भारत की वैचारिक चेतना का उत्सव है। पत्रकारिता कोई पेशा नहीं है, यह राष्ट्र चेतना का आंदोलन है।" श्री सिंधिया ने कहा कि समय, तकनीक और मंच बदल सकते हैं, लेकिन पत्रकारिता का धर्म नहीं बदलना चाहिए।
इस अवसर पर 'हिन्दी पत्रकारिता : 200 साल की महागाथा' पुस्तक का विमोचन किया गया। 'पद्मश्री' विजयदत्त श्रीधर और सच्चिदानंद जोशी द्वारा संपादित यह ग्रंथ हिन्दी पत्रकारिता की दो शताब्दियों की यात्रा का व्यापक दस्तावेज है, जिसमें 30 प्रमुख लेखकों के लेख संकलित हैं।
कार्यक्रम में श्रीकांत सिंह की पुस्तक 'हिन्दी पत्रकारिता के हिन्दीतर उन्नायक' का भी लोकार्पण किया गया। पुस्तक में गैर-हिन्दीभाषी क्षेत्रों के पत्रकारों के हिन्दी पत्रकारिता में योगदान का विवरण दिया गया है। समारोह का एक प्रमुख आकर्षण हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्षों की यात्रा पर आधारित विशेष प्रदर्शनी रही। इसमें हिन्दी के प्रमुख समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, युगनिर्माता संपादकों और ऐतिहासिक दस्तावेजों को प्रदर्शित किया गया। आगंतुकों को 'उदन्त मार्त्तण्ड' से लेकर समकालीन पत्रकारिता तक के विकासक्रम को देखने का अवसर मिला।
श्री राय ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा, "लोकतंत्र है तो पत्रकारिता है। अकेले पत्रकारिता नहीं हो सकती।" उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री और समाचार के बीच अंतर रेखांकित करते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर लिखी हर बात खबर नहीं होती। कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए श्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्षों की यात्रा प्रतिरोध और जनचेतना की यात्रा रही है।
स्वागत भाषण में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि पत्रकारिता, विशेषकर भाषाई पत्रकारिता, अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। उन्होंने कहा कि हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष भारत की अस्मिता की रक्षा और सांस्कृतिक चेतना के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय हैं।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें