श्रीलंका के डीएनए में छिपे 57,000 साल पुराने मानव सफर खुलासा


वाराणसी, 27 मई (वार्ता) क्या आधुनिक मानव ने अफ्रीका से निकलकर पूरी दुनिया में पैर पसारने के लिए समुद्र के किनारों को अपना रास्ता बनाया था। दशकों से वैज्ञानिक इस गुत्थी को सुलझाने में लगे थे। अब, प्लॉस वन जर्नल में प्रकाशित एक व्यापक जेनेटिक अध्ययन ने न केवल इस सवाल का जवाब दिया है, बल्कि श्रीलंका को मानव इतिहास के ‘प्रवेश द्वार’ के रूप में स्थापित कर दिया है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) और कोलंबो विश्वविद्यालय समेत विश्व भर के पांच संस्थानों के 16 शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस संयुक्त अध्ययन में श्रीलंका के तीन प्रमुख समुदायों सिंहली, श्रीलंकाई तमिल और वेद्दा के पूर्वजों का विस्तृत डीएनए विश्लेषण किया गया है। शोधकर्ताओं ने माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए का सहारा लिया, जो केवल माँ से संतान में जाता है और हजारों वर्ष पुरानी वंशावली का पता लगाने में मदद करता है।
शोध की प्रथम लेखिका श्रीलंका की डॉ. अंजना वेलिकला ने बताया कि इस अध्ययन में 139 नए जीनोम सीक्वेंस किए गए और उन्हें दुनिया भर के 247 वैश्विक डेटासेट्स के साथ मिलाकर विश्लेषण किया गया। यह अब तक इस क्षेत्र का सबसे बड़ा जेनेटिक अध्ययन है। ‘टाइम मशीन’ बना डीएनए, दक्षिणी मार्ग की पहेली सुलझी और पता लगा कि श्रीलंका चार चरणों में बसा।
प्रमुख शोधकर्ता और जीन विज्ञानी डॉ. ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि वैज्ञानिक लंबे समय से इस बहस में थे कि आधुनिक मानव अफ्रीका से निकलकर ऑस्ट्रेलिया और ओशिनिया तक कैसे पहुँचा। दो संभावित रास्ते थे ‘इनलैंड रूट’ (जमीनी रास्ता) और ‘कोस्टल रूट’ (समुद्री किनारा)। श्रीलंका के जेनेटिक डेटा ने ‘कोस्टल रूट’ की पुष्टि की है।
लगभग 57,000 साल पहले अफ्रीका से निकले शुरुआती आधुनिक मानवों का एक समूह हिंद महासागर के तटों के सहारे श्रीलंका पहुँचा। उस समय समुद्र का स्तर आज से काफी कम था, जिस कारण भारत और श्रीलंका के बीच ‘लैंड ब्रिज’ (जमीनी पुल) मौजूद था।
शोधकर्ताओं ने श्रीलंका में मानव बसावट की कहानी को चार प्रमुख कालखंडों में विभाजित किया है। प्रथम चरण (57,000 साल पहले): आधुनिक मानव की दक्षिण एशिया में पहली बसावट। श्रीलंका की फह-हिएन लेना और बटाडोम्बा-लेना गुफाओं में मिले 40,000 वर्ष पुराने अवशेष भी इसी यात्रा की पुष्टि करते हैं। ऐतिहासिक काल (7,000 साल से कम): खेती-बाड़ी और व्यापार के विस्तार से भारत-श्रीलंका के बीच आबादी का आदान-प्रदान बढ़ा। आधुनिक प्रवासन युग: व्यापारिक जहाजों और विदेशी आक्रमणों के कारण नए जेनेटिक मिश्रण बने।
शोध में श्रीलंका के आदिवासी वेद्दा समुदाय पर भी रोशनी डाली गई है। वेद्दा लोग सीधे उन प्राचीन मेसोलिथिक शिकारी-संग्राहकों के वंशज हैं जो सबसे पहले श्रीलंका में बसे थे। उनके डीएनए में ‘फाउंडर इफेक्ट’ स्पष्ट दिखता है। हजारों वर्षों तक बाहरी दुनिया से अलग-थलग रहने के कारण उनका जेनेटिक पूल प्राचीन बना रहा है, हालांकि उनकी आबादी तेजी से घट रही है।
अध्ययन से यह भी पता चला है कि श्रीलंका में ‘वेस्ट यूरेशियन’ जीन (जैसे हेप्लोग्रुप यू7 और एच13) सीधे नहीं, बल्कि भारत के माध्यम से आए। शोध से स्पष्ट हुआ है कि भले ही सिंहली और तमिल समुदायों की भाषा व संस्कृति अलग हो, लेकिन उनका जेनेटिक आधार काफी हद तक समान है। दोनों समूहों में दक्षिण भारतीय आबादी का गहरा प्रभाव देखा गया है। यह अध्ययन मानव प्रवासन के इतिहास को समझने में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगा।

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