बीएचयू के वैज्ञानिकों ने मूत्र के माध्यम से कैंसर की शुरुआती पहचान की नई तकनीक विकसित की
वाराणसी, 06 मई (वार्ता) उत्तर प्रदेश में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के विज्ञान संस्थान के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के शोधकर्ताओं ने चिकित्सा विज्ञान संस्थान (आईएमएस) के यूरोलॉजी विभाग के सहयोग से मूत्राशय कैंसर (यूबीसी) की प्रारंभिक पहचान के लिए एक नई गैर-आक्रामक मूत्र-आधारित तकनीक विकसित की है।यह अध्ययन स्कूल ऑफ बायोटेक्नोलॉजी के डॉ. समरेन्द्र कुमार सिंह तथा यूरोलॉजी विभाग, आईएमएस के डॉ. ललित कुमार के नेतृत्व में, डॉ. गरिमा सिंह, डॉ. अनिल कुमार, सृष्टी भट्टाचार्जी सहित शोध दल के महत्वपूर्ण योगदान से पूरा हुआ है।
शोधकर्ताओं ने प्रदर्शित किया कि मूत्र में उपस्थित एक्सोसोमल माइक्रोआरएनए कैंसर की पहचान के लिए अत्यंत स्थिर और विश्वसनीय बायोमार्कर के रूप में कार्य करते हैं। यह नई तकनीक वर्तमान जांच विधियों की सीमाओं को दूर करती है, जहां सिस्टोस्कोपी आक्रामक होती है और यूरिन साइटोलॉजी की संवेदनशीलता कम होती है।
शोध में तीन माइक्रोआरएनए के संयोजन (पैनल) ने 90 प्रतिशत से अधिक संवेदनशीलता प्रदर्शित की, जो इसे मूत्राशय कैंसर के लिए एक प्रभावी गैर-आक्रामक निदान उपकरण बनने की दिशा में अत्यंत संभावनाशील बनाता है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि ये बायोमार्कर कैंसर के विभिन्न चरणों के अनुसार अलग-अलग स्तर पर व्यक्त होते हैं, जिससे न केवल प्रारंभिक पहचान बल्कि रोग की प्रगति की निगरानी भी संभव हो सकेगी।
प्रमुख अन्वेषक डॉ. समरेन्द्र कुमार सिंह ने कहा, ''यह अध्ययन कैंसर निदान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम है। केवल मूत्र के नमूने से कैंसर की पहचान भविष्य में जांच प्रक्रिया को अधिक सरल और रोगी-अनुकूल बना सकती है।'' उन्होंने आगे कहा, ''माइक्रोआरएनए आधारित यह तकनीक न केवल कैंसर की पहचान में बल्कि उसके विकास को समझने में भी सहायक है, जिससे बेहतर उपचार रणनीतियां विकसित की जा सकती हैं।''
डॉ. ललित कुमार (सह-प्रमुख अन्वेषक एवं यूरोलॉजिस्ट) ने कहा, ''यह अध्ययन मूत्राशय कैंसर के गैर-आक्रामक और रोगी-अनुकूल निदान की दिशा में एक आशाजनक बदलाव का संकेत देता है। इस प्रकार की खोजें कैंसर निदान के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती हैं और समाज को व्यापक रूप से लाभान्वित कर सकती हैं।''
इन निष्कर्षों से बड़े स्तर पर बहु-केंद्रित अध्ययनों के लिए एक मजबूत आधार तैयार होता है, जिनके माध्यम से भविष्य में इसे क्लीनिकल निदान में उपयोग किए जाने की संभावनाएं हैं।

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