बीएचयू ने पलाश के फूलों से तैयार किया हर्बल कोम्बुचा पेय
वाराणसी, 8 मई (वार्ता) भारतीय वनस्पति विज्ञान और खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की शोध टीम ने सीनियर प्रोफेसर तथा वर्तमान में बीआरए बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दिनेश चंद्र राय के नेतृत्व में पारंपरिक औषधीय फूल ‘पलाश’ से शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट युक्त ‘कोम्बुचा’ पेय विकसित किया है।यह शोध विश्वप्रसिद्ध एल्सेवियर ग्रुप के अंतरराष्ट्रीय जर्नल फूड एंड ह्यूमैनिटी के 2026 के अंक में प्रकाशित हुआ है। वैश्विक बाजार में प्राकृतिक स्वास्थ्य पेय पदार्थों की बढ़ती मांग को देखते हुए इस शोध को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह शोध उच्च-स्तरीय अंतरराष्ट्रीय सहयोग का परिणाम है, जिसमें बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के डेयरी विज्ञान एवं खाद्य प्रौद्योगिकी विभाग की सुमन भारती और अरविंद कुमार के साथ ऑस्ट्रेलिया की डीकिन यूनिवर्सिटी के सीएएसएस फूड रिसर्च सेंटर से आकांशा गुप्ता शामिल रहीं।
शोध टीम की इस उपलब्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए कुलपति प्रो. दिनेश चंद्र राय ने कहा कि यह शोध ‘स्थानीय से वैश्विक’ की दिशा में एक बड़ा कदम है। उन्होंने आगे कहा कि पलाश जैसे पारंपरिक भारतीय फूलों की औषधीय शक्ति को आधुनिक विज्ञान के माध्यम से दुनिया के सामने लाना उनकी शोध टीम की बड़ी उपलब्धि है।
प्रो. राय ने कहा, “यह अनुसंधान न केवल स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं के लिए बेहतर विकल्प प्रदान करेगा, बल्कि ग्रामीण संसाधनों के मूल्यवर्धन के जरिए किसानों के लिए समृद्धि के नए मार्ग भी प्रशस्त करेगा।”
उन्होंने बताया कि हाई-रेजोल्यूशन मास स्पेक्ट्रोमेट्री और एटीआर-एफटीआईआर जैसी अत्याधुनिक तकनीकों के जरिए यह सिद्ध किया गया कि किण्वन (खमीरीकरण) की प्रक्रिया पलाश के फूलों की जैविक शक्ति को कई गुना बढ़ा देती है। शोध में पाया गया कि किण्वन के बाद पलाश कोम्बुचा में एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि में 22.78% की वृद्धि हुई तथा कुल फेनोलिक सामग्री 126.77 से बढ़कर 263.54 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम हो गई।
इसके अलावा, विश्लेषण में होमोब्यूटिन-4-ग्लूकोसाइड और क्वेरसेटिन-3-β-D-ग्लूकोसाइड जैसे नए मेटाबोलाइट्स की पहचान हुई, जो सूजन-रोधी और तंत्रिका-रक्षा गुणों के लिए विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हैं।
प्रो. राय ने आगे कहा कि व्यावसायिक दृष्टिकोण से भी यह शोध मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह तकनीक न केवल भारतीय आयुर्वेद को वैश्विक पहचान दिलाएगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर पलाश जैसे कम उपयोग वाले फूलों के माध्यम से सतत कृषि और जैव-विविधता को भी बल प्रदान करेगी।
दोनों विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक समुदाय तथा एलुम्नी एसोसिएशन ने प्रो. राय को बधाई देते हुए विश्वास जताया कि यह नवाचार खाद्य विज्ञान के क्षेत्र में भारत की संप्रभुता को और मजबूत बनाएगा।

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