हड्डी रोग के इलाज का भविष्य जोड़ को बदलने में नहीं, बल्कि उसे बचाने में हैः डॉ. नरेश
नयी दिल्ली, 03 मई (वार्ता) हड्डी रोग के इलाज में रिप्लेसमेंट से रीजेनरेशन की ओर बढ़ते रुझान को मजबूती देते हुए वरिष्ठ आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. नरेश के. अग्रवाल ने रविवार को यहां अपना चर्चित 'लुधियाना प्रोटोकॉल' प्रस्तुत करते हुए कहा कि इस रोग के इलाज का भविष्य जोड़ को बदलने में नहीं, बल्कि उसे बचाने में है। यदि समय पर सही रीजेनरेटिव उपचार शुरू किया जाए, तो बड़ी संख्या में मरीजों में सर्जरी की जरूरत को टाला जा सकता है।दिल्ली के होटल नोवोटेल सिटी सेंटर में दिल्ली ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन के तत्वावधान में, इंडियन ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन के सहयोग से दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें देशभर के विशेषज्ञों ने ऑर्थोबायोलॉजिक्स के क्षेत्र में व्यावहारिक और साक्ष्य-आधारित इलाज तरीकों पर चर्चा की।
सम्मेलन के दूसरे दिन रविवार को घुटनों पर केंद्रित वैज्ञानिक सत्र में डॉ. अग्रवाल ने घुटने के ऑस्टियोआर्थराइटिस के प्रबंधन के लिए एक समेकित और कम हस्तक्षेप वाला दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। यह तरीका पारंपरिक जॉइंट रिप्लेसमेंट पर निर्भरता से आगे बढ़ते हुए, बीमारी के मूल कारण को समझने पर आधारित है। उनकी प्रस्तुति ने इस बात पर जोर दिया कि ऑस्टियोआर्थराइटिस केवल घिसाव नहीं, बल्कि शरीर में होने वाली लंबे समय की सूजन से जुड़ी स्थिति है।
गौरतलब है कि लुधियाना प्रोटोकॉल का आधार एक समग्र रणनीति है, जिसमें प्लेटलेट-रिच प्लाज़्मा (पीआरपी), ग्रोथ फैक्टर्स और अन्य ऑर्थोबायोलॉजिक उपचारों को शरीर की सूजन कम करने वाले उपायों के साथ जोड़ा जाता है। इसका उद्देश्य प्राकृतिक जोड़ को सुरक्षित रखना, उसके अंदर के वातावरण को बेहतर बनाना और लंबे समय तक कार्यक्षमता बनाए रखना है।
डॉ. अग्रवाल ने कहा, "ऑर्थोपेडिक्स का भविष्य जोड़ को बदलने में नहीं, बल्कि उसे बचाने में है। यदि समय पर सही रीजेनरेटिव इलाज शुरू किया जाए, तो बड़ी संख्या में मरीजों में सर्जरी की जरूरत को टाला जा सकता है।"
इस शैक्षणिक मंच का नेतृत्व आयोजन सचिव डॉ. करुण जैन और वैज्ञानिक अध्यक्ष डॉ. आशिम गुप्ता ने किया। दोनों ने शोध और क्लिनिकल प्रैक्टिस के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता पर जोर दिया।
डॉ. जैन ने कहा, "दिल्ली ऑर्थोबायोलॉजिक्स कोर्स का उद्देश्य डॉक्टरों को ऐसा व्यावहारिक और साक्ष्य-आधारित ज्ञान देना है, जिसे वे सीधे मरीजों के इलाज में लागू कर सकें।"
डॉ. गुप्ता ने कहा, "ऑर्थोबायोलॉजिक्स तेजी से विकसित हो रहा क्षेत्र है। ऐसे में जरूरी है कि डॉक्टर वैज्ञानिक प्रगति के साथ अपडेट रहें और इलाज में सुरक्षा तथा मानकीकरण पर ध्यान दें।"
दो दिवसीय इस कोर्स में बोन मैरो एस्पिरेट कंसंट्रेट (बीएमएसी), पीआरपी, स्टेम सेल थेरेपी और अल्ट्रासाउंड-गाइडेड तकनीकों जैसे उन्नत उपचारों पर विस्तार से चर्चा हुई। यह ऑर्थोपेडिक देखभाल में गैर-सर्जिकल विकल्पों की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।

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