पुलिस मुठभेड़ में पैरों में गोली मारने पर उच्चतम न्यायालय नाराज , कहा. सजा देना न्यायपालिका का अधिकार

प्रयागराज,( दिनेश तिवारी) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पुलिस मुठभेड़ों में अभियुक्तों के पैरों में गोली मारने की बढ़ती घटनाओं पर कड़ी  नाराजगी जताई है।

न्यायालय ने कहा कि पुलिस अधिकारी सिर्फ तारीफ, समय से पहले प्रमोशन और सोशल मीडिया पर वाहवाही के लिए अनावश्यक रूप से गोली चल रहे हैं |  किसी अपराधी को सजा देना न्यायपालिका का काम है , पुलिस का नहीं। घटना के दौरान किसी पुलिसकर्मी को चोट न लगना संदेह पैदा करता है।

न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल कि बेंच ने राजू उर्फ राजकुमार की जमानत अर्जी पर यह आदेश  दिया है| न्यायालय ने इसे कानून के शासन और सांविधानिक मर्यादाओं के खिलाफ बताते हुए कहा कि यदि पुलिस मुठभेड़ मामलों मे उच्चतम न्यायालय कि गाइडलाइंस का पालन नहीं हुआ तो जिले पुलिस अधीक्षक, वरिस्थ पुलिस अधीक्षक और पुलिस कमिश्नर  व्यक्तिगत रूप से कोर्ट कि अवमानना के दोषी माने जाएंगे |

 न्यायालय ने कहा कि किसी भी आरोपी को सजा देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है, पुलिस के पास नहीं। भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहाँ कानून संविधान के अनुसार चलता है, न कि व्यक्तिगत सोच के आधार पर | न्यायालय ने कहा कि कई मामलों मे पुलिस अधिकारी जानबूझकर आरोपी के घुटने के नीचे पैर मे गोली मरते हैं, ताकि मामला “ हाफ एनकाउंटर” कहलाये और वे बहादुरी का श्रेय ले सकें| कानून कि नजर मे यह तरीका पूरी तरह अस्वीकार्य है |

अदालत ने राजू को सशर्त जमानत दे दी है। न्यायालय ने दिशा.निर्देशों की अनदेखी पर अवमानना की कार्यवाही की चेतावनी भी दी है। मिर्जापुर निवासी राजू पर कोतवाली देहात थाने में विभिन्न आरोपों में प्राथमिकी दर्ज है। उसकी जमानत के लिए उच्च न्यायालय में अर्जी दायर की थी। याची की अधिवक्ता कुसुम मिश्रा ने दलील दी कि याची को झूठे मामले में फंसाया गया। कथित पुलिस मुठभेड़ में उच्च न्यायालय के दिशा निर्देशों का पालन नहीं किया गया।

न्यायालय ने इसे गंभीरता से लेते हुए अपर मुख्य सचिव (गृह) व डीजीपी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये तलब कर जवाब मांगा था।  दोनों अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये हाजिर हुए और भरोसा दिलाया कि मुठभेड़ मामले में उच्चतम न्यायालय के दिशा निर्देशों का कड़ाई से पालन करने के लिए सर्कुलर जारी किए गए हैं। इनका पालन न करने पर कार्रवाई की जाएगी।

न्यायालय ने कहा कि हाल के दिनों में छोटे.छोटे अपराधों जैसे चोरी या लूट के मामलों में भी पुलिस की ओर से मुठभेड़ दिखाकर आरोपियों के पैरों में गोली मारने की घटनाएं सामने आ रही हैं। वर्तमान मामले में किसी भी पुलिसकर्मी को चोट नहीं आई है। इससे संदेह होता है।

उच्चतम न्यायालय के (यूपीसीएल ) बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मुठभेड़ में मौत या गंभीर चोट की स्थिति में तुरंत एफआईआर दर्ज की जाए और जांच स्वतंत्र एजेंसी, जैसे सीबीसीआईडी या किसी अन्य उच्च न्यायालय ने थाने की टीम से कराई जाए। घायल व्यक्ति का बयान मजिस्ट्रेट या मेडिकल अधिकारी के समक्ष दर्ज करना अनिवार्य होगा।

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