युवा मस्तिष्क नशे की ओर क्यो बढ़ रहा है : डॉक्टर सोनकर

पद्मश्री से सम्मानित वैज्ञानिक डॉक्टर अजय कुमार सोनकर युवाओं मे बढ़ती नशे और शराब की प्रवृत्ति चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इसे नैतिक पतन या अनुशासनहीनता के रूप मे देखने को एक गंभीर वैज्ञानिक भूल बताया है |

डॉक्टर सोनकर ने स्पष्ट किया कि यह समस्या दरअसल युवाओं के मस्तिष्क मे हो रहे जैविक और न्यूरोलॉजिकल बदलाव का परिणाम है, जिसे आज का तनावपूर्ण वातावरण लगातार और गहरा कर रहा है |उन्होंने बताया कि मानव मस्तिष्क एक साथ पूरी तरह विकसित नहीं होता| भावनाओं और उत्तेजना से जुड़ा हिस्सा बहुत जल्दी सक्रिय हो जाता है, जबकि निर्णय  लेने और आत्म नियंत्रण से जुड़ा प्रीफॅन्टल कॉनटेक्स  लगभग 24-25 वर्ष कि उम्र तक पूरी तरह परिपक्व होता है | उन्होंने कहा कि इसी कारण युवा भावनात्मक रूप से बहुत तीव्र अनुभव करते हैं| लेकिन उन्हे नियंत्रित करने की जैविक क्षमता अभी पूरी तरह विकसित नही होती|

उन्होंने बताया कि इस  स्थित मे जब अधिक दबाव पड़ता है , तब मस्तिष्क  आसान और त्वरित राहत के रास्ते  खोजता है| डॉक्टर सोनकर ने कहा कि आज का युवा लगातार प्रतियोगिता, असफलता के भय , रोजगार की  अनिश्चितता और सामाजिक तुलना के बोझ तले जी रहा है | इस निरंतर तनाव के कारण शरीर मे कॉर्टिसोल  हार्मोन लंबे  समय तक ऊंचा बना रहता है | उन्होंने बताया कि कॉर्टिसोल मस्तिष्क के उस हिस्से को कमजोर करता है जो  सही निर्णय लेने मे मदद करता है, जबकि ड़र और चिंता से जुड़े हिस्से को अत्यधिक सक्रिय कर देता है | इसका पारिणाम यह होता है कि युवा हर समय वेचनी और असुरक्षा कि स्थिति मे रहने लगते हैं|

डॉक्टर सोनकर ने यह भी खुलासा किया कि  यह तनाव केवल मानसिक नहीं रहता , बल्कि एपिजेनेटिक  स्तर पर जीनों कि अभिव्यक्ति को भी बदल देता है | उन्होंने कहा कि लगातार दबाव मे रहने से वे जीन सक्रिय हो जाते हैं जो भय , आवेग और नशे कि चाह से जुड़े होते हैं, जबकि आत्मनियंत्रण और सहनशीलता से जुड़े जीन दब जाते हैं| उन्होंने बताया कि डीएनए मे बदलाव नहीं है, बल्कि वातावरण द्वारा  मस्तिष्क को दोबारा प्रोग्राम किया जाना है|

प्रयागराज के वैज्ञानिक और काले मोती के जनक डॉक्टर सोनकर ने डोपामिन की  भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसे खुसी का रसायन समझना गलत है| यह आशा, प्रेरणा और जीवन मे अर्थ कि अनुभूति से जुड़ा होता है| उन्होंने बताया कि जब युवा बारबार असफलता और अनिश्चित्ता का सामना करते हैं, तो डोपामिन प्रणाली कमजोर हो जाती है  और जीवन नीरस व अर्थहीन लगने लगता है | नशीले पदार्थ कृतिम रूप से डोपामिन बढ़ाकर मस्तिष्क आस्थाई राहत देते हैं और मस्तिष्क यह सीख लेता है जो राहत जीवन नहीं दे पा रहा, वह नशा दे रहा है| उन्होंने बताया कि नशीले पदार्थ मस्तिष्क के उस तंत्र को सक्रिय करते हैं जो शांति और मानसिक मौन प्रदान करता है| उन्होंने बताया कि बेचैन और शोर से भरे मस्तिष्क को नशा कुछ समय के लिए शांत बनाता है|

डॉक्टर सोनकर ने चेतवानी दी कि यह केवल भ्रम है , क्योंकि धीरे धीरे मस्तिष्क अपनी प्राकृतिक शांति प्रणाली को खो देता है और नशे कि निर्भरता बढ़ती चली जाती है| उन्होंने यह भी कहा कि आज का युवक डिजिटल रूप से जुड़ा हुआ है लेकिन भावनात्मक रूप से बिल्कुल    अकेला है| मार्ग दर्शन देने वाले वयस्कों, सामुदायिक जुड़ाव और उद्देश्यपूर्ण संवाद की  कमी के कारण मस्तिष्क मे अपनापन और भावनात्मक संतुलन देने वाले रसायन कम हो जाते हैं| इस  खालीपन को भरने के लिए नशा एक  रासायनिक विकल्प बन जाता है | डॉक्टर सोनकर ने कहा कि नशा स्वयम समस्या नहीं है बल्कि यह एक चेतावनी संकेत है| यह संकेत है कि मस्तिष्क थक चुका है, तनाव से टूट चुका है और उसे सुरक्षा तथा अर्थ कि आवश्यकता है| उन्होंने बताया कि दंड और शर्म इसे और बढ़ते हैं, क्योंकि डर पहले से अत्यधिक होता है|

उन्होंने बताया कि यदि युवाओं को नशे से दूर करना है तो उनके मस्तिष्क को ठीक करना होगा  इसके लिए स्थिर और सुरक्षित वातावरण, उद्देश्यपूर्ण शिक्षा, शारीरिक गतिविधि, मानवीय संबंध और भावनात्मक समझ विकसित करना आवश्यक है| “युवा नशा नहीं चाहते, वे राहत, सुरक्षा और भविष्य कि आशा चाहते हैं” और यदि समाज यह दे पाए, तो मस्तिष्क स्वयं स्वास्थ्य होने की क्षमता रखता है|

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