भारतीय विमान सेवा कंपनियों को तय दर पर मिलेगा विमान ईंधन, मूल्य स्थिरीकरण कोष को मंत्रिमंडल की मंजूरी

भारतीय विमान सेवा कंपनियों को तय दर पर  मिलेगा विमान ईंधन, मूल्य स्थिरीकरण कोष को मंत्रिमंडल की मंजूरी

नयी दिल्ली, 03 जून (वार्ता) अंतर्राष्ट्रीय बाजार में विमान ईंधन की कीमतों में भारी उछाल के बीच केंद्र सरकार ने भारतीय विमान सेवा कंपनियों को बड़ी राहत देते हुए मूल्य स्थिरीकरण कोष की स्थापना को मंजूरी दी है। इससे उन्हें स्थिर दाम पर ईंधन मिल सकेगा और तेल विपणन कंपनियों को भी इस मद में बोझ नहीं उठाना पड़ेगा।


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में तेल विपणन कंपनियों को एक बार के लिए अधिकतम 10,000 करोड़ रुपये के बजटीय समर्थन को मंजूरी प्रदान की गयी। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मीडिया को बताया कि यह व्यवस्था तीन साल के लिए है। इसके तहत घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों के लिए विमान ईंधन की कीमतें तय कर दी जायेंगी।


 उन्होंने बताया कि व्यवस्था का लाभ उठाने के लिए विमान सेवा कंपनियों को तेल विपणन कंपनियों के साथ एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करना होगा। इसके तहत वे तीन साल तक उनसे ही विमान ईंधन खरीदने के लिए बाध्य होंगे। इस समझौते पर नागरिक उड्ड्यन मंत्रालय और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अधिकारियों के भी हस्ताक्षर होंगे।


 इस राशि का इस्तेमाल तेल विपणन कंपनियां भारतीय एयरलाइंस को तय कीमत पर विमान ईंधन की आपूर्ति के लिए कर सकेंगी। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के जरिये उन्हें ब्याज मुक्त ऋण के रूप में यह पैसा मिलेगा। जब भी योजना के तहत विमान ईंधन की तय कीमत आयात समतुल्य मूल्य से कम होगी तो नुकसान की भरपाई इस ऋण राशि से होगी। जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में विमान ईंधन सस्ता होगा तो अंतर के बराबर पैसे की वसूली तेल विपणन कंपनियों से की जायेगी। यह व्यवस्था तब तक जारी रहेगी जब तक पूरी राशि की वसूली न हो जाये।


 व्यवस्था लागू कराने के लिए इन दोनों मंत्रालयों के अलावा वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग के प्रतिनिधियों की एक समिति का गठन किया जायेगा।


 पश्चिम एशिया संकट के कारण अंतर्राष्ट्रीय बाजार में विमान ईंधन के दाम करीब ढाई गुणा होने के बाद यह फैसला किया गया है। मई में सरकार ने घरेलू उड़ानों के लिए विमान ईंधन की कीमत में अधिकतम 25 प्रतिशत वृद्धि की सीमा तय कर दी थी। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय मार्गों पर अब भी उन्हें काफी ऊंची कीमत चुकानी पड़ रही थी। इसके साथ ही तेल विपणन कंपनियों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा था।

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