क्या चीन 'पांच उंगली सिद्धांत' पर चल रहा है?


नयी दिल्ली, 29 जून (वार्ता) चीन से लगी अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर स्थित ताकसिंग इलाके से कुछ गंभीर आरोप सामने आये हैं और अगर ये आरोप सच साबित होते हैं, तो इस सीमावर्ती क्षेत्र में सैनिकों की तैनाती को काफी ज्यादा बढ़ाना पड़ सकता है।

दरअसल, ऊपरी सुबनसिरी जिले के स्थानीय आदिवासी समुदायों के हक में काम करने वाली संस्था 'नाह वेलफेयर सोसाइटी' ने दावा किया है कि चीनी सेना (पीएलए) सुबनसिरी नदी के उत्तरी हिस्से में मौजूद ताकसिंग के पास की उन जमीनों पर धीरे-धीरे कब्जा कर रही है, जिनका इस्तेमाल स्थानीय लोग पारंपरिक रूप से अपने पशुओं को चराने और शिकार करने के लिए करते आये हैं।
स्थानीय प्रशासन को भेजे एक पत्र में इस संस्था ने आरोप लगाया है कि चीनी सेना ने उन इलाकों में अपनी सड़कें, पुल और सैन्य ठिकाने बना लिए हैं, जहां कुछ साल पहले तक हमारे स्थानीय लोग बिना किसी रोक-टोक के आसानी से आते-जाते थे।
वैसे, सीमा पर इस तरह के आरोप पहले भी लगते रहे हैं। हालांकि, पहले सामने आए कुछ दावे गलत भी साबित हुए थे, क्योंकि तब चीनी सेना 890 किलोमीटर लंबी 'मैकमोहन रेखा' (भारत-चीन सीमा) के अंदर ही मौजूद थी। लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता, जैसे 1986 में हुआ 'सुंदरोंग चू विवाद' चीन की तरफ से अरुणाचल प्रदेश में की गयी असली घुसपैठ का मामला था।
उस समय सुंदरोंग चू की घटना के दौरान भारत के तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल के. सुंदरजी ने एक बड़ा कदम उठाया था। उन्होंने ऊंचे हिमालयी क्षेत्र के उस चरागाह को वापस अपने नियंत्रण में लेने के लिए भारतीय सैनिकों और तोपों को हवाई जहाज के जरिए सीधे वहां उतारने का आदेश दे दिया था। इसके तुरंत बाद, 1987 में पूरी पूर्वी सीमा पर 'ऑपरेशन चेकरबोर्ड' चलाया गया, ताकि चीन को भारत की मजबूत सैन्य तैयारियों और ताकत का अंदाजा हो सके।
चीन असल में अरुणाचल प्रदेश के एक बड़े हिस्से पर अपना दावा ठोकता है और इसे 'दक्षिण तिब्बत' का नाम देता है। अपने इस दावे को दुनिया के सामने सही दिखाने के लिए वह अक्सर अरुणाचल की अलग-अलग पहाड़ियों और इलाकों के नये-नये चीनी नाम रखता रहता है, जिसे एक तरह से 'नक्शे के जरिए जबरन दावा बनाने की चाल' कहा जा सकता है।
रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि असली समस्या यह है कि बीते कुछ सालों में चीन ने तिब्बत के पठारी इलाके में हर मौसम में चालू रहने वाली पक्की सड़कों, हवाई पट्टियों, पुलों और सेना व आम लोगों के रहने लायक दोहरे उपयोग वाले गांवों का एक बहुत बड़ा जाल बिछा दिया है। इस मजबूत बुनियादी ढांचे के दम पर चीन अब विवादित इलाकों में पहले से कहीं ज्यादा गश्त करने लगा है।
भारत के रणनीतिक मामलों के कई विशेषज्ञ चीन की इस चालाकी को 'फाइव फिंगर्स ऑफ तिब्बत' के पुराने सिद्धांत के रूप में देखते हैं। माना जाता है कि यह बात 1949 में चीन के सबसे बड़े नेता माओत्से तुंग ने कही थी, हालांकि चीन के किसी भी आधिकारिक सरकारी दस्तावेज में इसका कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं मिलता है।
इस सोच के मुताबिक, तिब्बत को एक 'हथेली' माना गया है, और इसके जरिए चीन अपना असर पांच उंगलियों यानी लद्दाख, नेपाल, भूटान, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश तक फैलाना चाहता है। भले ही इतिहासकार इस बात के महत्व पर आपस में बहस करते हों, लेकिन आज की परिस्थितियों में यह सिद्धांत बिल्कुल सटीक बैठता है क्योंकि चीन सचमुच पूरे हिमालयी क्षेत्र में अपने पैर पसारने की लगातार कोशिश कर रहा है।
इस पूरे विवाद के पीछे का इतिहास भी समझना बहुत जरूरी है। जब भारत पर अंग्रेजों का राज था, तब ब्रिटिश सरकार तिब्बत को रूस के साम्राज्यवादी खतरों से बचने के लिए एक 'बफर स्टेट' (दो बड़े देशों के बीच का एक स्वतंत्र इलाका) मानती थी और उसकी आजादी को बनाए रखना चाहती थी। लेकिन साल 1950 में जब चीन ने तिब्बत पर पूरी तरह कब्जा कर लिया, तो वह पुराना भूगोल हमेशा के लिए खत्म हो गया। इसके साथ ही, जो सीमा पहले भारत और तिब्बत के बीच हुआ करती थी, वह अब करीब 3,500 किलोमीटर लंबी सीधी भारत-चीन सीमा में बदल गई।
चीन का विवाद सिर्फ भारत के अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख तक ही सीमित नहीं है। वह लगातार नेपाल के इलाकों में भी घुसपैठ करता रहा है। इस बात का खुलासा साल 2021 में नेपाल सरकार के ही एक लीक हुए गोपनीय दस्तावेज और वहां के एक सांसद की जांच रिपोर्ट से हुआ था। उस रिपोर्ट में सामने आया था कि चीन ने सीमा तय करने वाले खंभों को तोड़ दिया और नेपाल के हुमला तथा सिंधुपालचौक जिलों के काफी अंदर तक घुसकर अपनी इमारतें और निर्माण कार्य कर लिये।
ठीक इसी तरह, चीन भूटान की सीमाओं पर भी गिद्ध दृष्टि जमाए हुए है। वह पश्चिमी भूटान के डोकलाम पठार के लगभग 269 वर्ग किलोमीटर हिस्से पर, मध्य भूटान की जाकारलुंग और पासारलुंग घाटियों की 495 वर्ग किलोमीटर जमीन पर और पूर्वी भूटान के सक्तेंग इलाके की 650 वर्ग किलोमीटर जमीन पर अपना मालिकाना हक जताता है।
कई रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इन तमाम चीनी दावों की असली जड़ तिब्बत का मुद्दा ही है। इसीलिए माओत्से तुंग का वह अनधिकृत बयान आज सच होता दिखता है, जिसमें उन्होंने कहा था, "तिब्बत तो बस एक हथेली है, जिस पर कब्जा करना हमारा पहला मकसद है। इसके बाद हम इसकी पांचों उंगलियों (लद्दाख, नेपाल, भूटान, सिक्किम और अरुणाचल) को भी हासिल करके रहेंगे।"
ऐसी स्थिति में भारत के सामने चुनौती सिर्फ सीमा पर फौज बढ़ाने तक सीमित नहीं रह गयी है। भारत के लिए अब यह भी बेहद जरूरी हो गया है कि वह सीमा पर बसे गांवों में बुनियादी सुविधाएं दे ताकि वहां आबादी बनी रहे, लोग आर्थिक रूप से मजबूत हों और देश की मुख्यधारा से जुड़े रहें। उपग्रह या राजनयिक बातचीत के जरिए तो सीमा पर हुए बदलावों का पता काफी बाद में चलता है, लेकिन वहां रहने वाले स्थानीय नागरिक ही जमीन पर होने वाली किसी भी चीनी हलचल के सबसे पहले गवाह बनते हैं।

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