मानवता की सबसे बड़ी छलांग से लेकर भविष्य के चंद्र अभियानों तक चंद्रमा
क्या होता है अंतराष्ट्रीय चंद्र दिवस और क्यों मनाया जाता है ?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि जैसा कि हम जानते हैं कि रात्रि के शांत आकाश में चमकता हुआ चंद्रमा सदियों से मानव सभ्यता के आकर्षण, जिज्ञासा और कल्पनाओं एवं रहस्यों का केंद्र रहा है। कभी इसे देवत्व का प्रतीक माना गया, कभी राहु एवं केतु से जोड़ा गया ,कभी समय और ऋतुओं का निर्धारक,तो कभी कवियों और साहित्यकारों की प्रेरणा बनता रहा है लेकिन विज्ञान ने उस कल्पना को वास्तविकता में बदल दिया था जब 20 जुलाई 1969 को पहली बार किसी मनुष्य ने चंद्रमा की सतह पर कदम रखा। यह घटना केवल अमेरिका या नासा की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि पूरी मानवता के इतिहास का ऐसा अध्याय थी जिसने यह सिद्ध कर दिया कि विज्ञान और संकल्प के बल पर असंभव प्रतीत होने वाले लक्ष्य भी प्राप्त किए जा सकते हैं। इसी ऐतिहासिक उपलब्धि की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 20 जुलाई को अंतर्राष्ट्रीय चंद्र दिवस (International Moon Day) मनाया जाता है। यह दिवस अतीत की महान वैज्ञानिक उपलब्धियों को याद करने के साथ-साथ भविष्य के चंद्र अभियानों, अंतरराष्ट्रीय सहयोग तथा अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग के प्रति जागरूकता बढ़ाने का अवसर भी है।
संयुक्त राष्ट्र ने क्यों घोषित किया अंतर्राष्ट्रीय चंद्र दिवस?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 9 दिसंबर 2021 को अपने प्रस्ताव के माध्यम से 20 जुलाई को अंतर्राष्ट्रीय चंद्र दिवस घोषित किया और यह निर्णय बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग पर संयुक्त राष्ट्र समिति की सिफारिश के आधार पर लिया गया। इसका उद्देश्य चंद्रमा के वैज्ञानिक अध्ययन, सतत एवं जिम्मेदार उपयोग, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और अंतरिक्ष विज्ञान के प्रति वैश्विक जागरूकता को बढ़ावा देना है और इस दिवस का पहला आधिकारिक आयोजन 20 जुलाई 2022 को किया गया था।
क्यों और क्या है 20 जुलाई का ऐतिहासिक महत्व।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 20 जुलाई 1969 को नासा का अपोलो-11 मिशन मानव इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण अंतरिक्ष मिशन बन गया क्योंकि उस मिशन के तीन सदस्य थे, नील आर्मस्ट्रांग, एडविन "बज़" एल्ड्रिन और माइकल कॉलिन्स। जब लूनर मॉड्यूल ईगल (Eagle) चंद्रमा के सी ऑफ ट्रैंक्विलिटी (Sea of Tranquility) या जिसे उपमा के रूप में चंद्रमा पर शांत सागर भी कहा जाता है उसके क्षेत्र में सफलतापूर्वक उतरा, तब पूरी दुनिया की निगाहें इस ऐतिहासिक क्षण पर टिकी थीं कि आख़िर चन्द्रमा पर क्या अनोखा घटित होने वाला है और वही हुआ जब मानव चन्द्रमा पर पहुंचा, नील आर्मस्ट्रांग चंद्रमा पर कदम रखने वाले पहले मानव बने और लगभग 19 मिनट बाद बज़ एल्ड्रिन भी उनके साथ चंद्र सतह पर पहुँचे। इस दौरान माइकल कॉलिन्स कमांड मॉड्यूल कोलंबिया में चंद्रमा की कक्षा में बने रहे और चंद्रमा पर कदम रखते ही नील आर्मस्ट्रांग के शब्द इतिहास में अमर हो गए जैसा कि उन्होंने कहा था कि
"यह एक व्यक्ति के लिए छोटा कदम है, लेकिन मानवता के लिए एक बहुत बड़ी छलांग है।" यही वह क्षण था जिसने अंतरिक्ष विज्ञान की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।
क्या है अपोलो-11 के विज्ञान, साहस और तकनीक की अद्भुत कहानी
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 16 जुलाई 1969 को फ्लोरिडा स्थित कैनेडी स्पेस सेंटर से शक्तिशाली सैटर्न-V रॉकेट द्वारा अपोलो-11 का प्रक्षेपण हुआ। लगभग चार दिनों की यात्रा के बाद अंतरिक्ष यान चंद्रमा की कक्षा में पहुँचा, जैसा कि नासा के इतिहास में दर्ज है कि लैंडिंग के अंतिम क्षण अत्यंत चुनौतीपूर्ण थे और कंप्यूटर चेतावनी संकेत दे रहा था और ईंधन भी बहुत कम बचा था। निर्धारित स्थान पर बड़ी-बड़ी चट्टानें होने के कारण नील आर्मस्ट्रांग ने मैनुअल नियंत्रण संभाला और सुरक्षित स्थान पर लैंडिंग कराई। यही निर्णय मिशन की सफलता का कारण बना।
अपोलो 11 के अंतरिक्ष यात्रियों ने लगभग कितने घंटे चंद्रमा की सतह पर बिताए और क्या किया वहां पर।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने इस बारे में प्रकाश डालते हुए बताया कि अंतरिक्ष यात्रियों ने लगभग 21 घंटे चंद्रमा की सतह पर बिताए एवं कई वैज्ञानिक प्रयोग किए साथ ही वहां पर कुछ उपकरण भी स्थापित किए तथा लगभग 21.5 किलोग्राम चंद्र शैल एवं मिट्टी के नमूने पृथ्वी पर लेकर आए। इन नमूनों ने चंद्रमा की उत्पत्ति और संरचना को समझने में वैज्ञानिकों की काफ़ी महत्वपूर्ण सहायता की है।
क्यों है मानव सभ्यता और चंद्रमा का हजारों वर्षों का संबंध।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि चंद्रमा केवल एक प्राकृतिक खगोलीय पिंड ही नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की कोतूहलपूर्ण जिज्ञासा का भी अभिन्न अंग रहा है। प्राचीन भारत, चीन, मिस्र, यूनान और मेसोपोटामिया सहित अनेक सभ्यताओं ने पंचांग निर्माण, कृषि, समुद्री यात्रा तथा धार्मिक अनुष्ठानों आदि में भी चंद्रमा का ही उपयोग किया था इसीलिए मानव सभ्यता का चंद्रमा के प्रति ख़ास जुड़ाव रहा है।
वैज्ञानिक दृष्टि से चंद्रमा का क्या महत्व है।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी चंद्रमा का महत्व अत्यंत बड़ा है जैसे कि इसका गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी पर ज्वार-भाटा उत्पन्न करता है, पृथ्वी के घूर्णन अक्ष को अपेक्षाकृत स्थिर बनाए रखने में सहायता करता है तथा पृथ्वी की दीर्घकालिक जलवायु स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और साथ ही निकट एवं दूर भविष्य में ही सही लेकिन और भी महत्वाकांक्षी मानवीय मिशनों में शामिल है चन्द्रमा जोकि घर से दूर एक अनोखा घर और परग्रहीय यात्राओं में महती भूमिका अदा कर सकेगा।
भारत की चंद्र उपलब्धियों में कैसे शामिल है चन्द्रमा।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय चंद्र दिवस भारत के लिए एक विशेष महत्व रखता है क्योंकि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने सीमित संसाधनों में विश्वस्तरीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं जो भारत को दुनिया में अंतरिक्ष अन्वेषण में एक अलग मुकाम पर खड़ा करता है जैसे कि अगर हम बात करें भारतीय चंद्र मिशनों की तो पाते हैं कि चंद्रयान-1 (2008) ने चंद्रमा की सतह पर जल-अणुओं की उपस्थिति के महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत किए, जिसने वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है और चंद्रयान-2 (2019) का ऑर्बिटर आज भी चंद्रमा का अध्ययन कर महत्वपूर्ण आंकड़े भेज रहा है, साथ ही 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के निकट सफल सॉफ्ट लैंडिंग कर इतिहास रच दिया था ,भारत ऐसा करने वाला विश्व का पहला देश बना। इसी उपलब्धि के सम्मान में भारत सरकार प्रत्येक वर्ष 23 अगस्त को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस भी मनाती है।
कैसा होगा भविष्य का चंद्र युग।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि आज चंद्रमा केवल वैज्ञानिक जिज्ञासा का ही विषय नहीं रहा, बल्कि दुनियां के भविष्य की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का आधार बनता जा रहा है। जैसा कि हम अवगत हैं कि नासा का आर्टेमिस कार्यक्रम मनुष्यों को पुनः चंद्रमा पर भेजने की तैयारी कर रहा है और भारत में भी चन्द्रयान 4 एवं अन्य मिशनों की तैयारियां भी अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए जोरों से चल रही हैं एवं अन्य देशों के भी चन्द्र मिशन भी लगातार कार्यरत हैं इनको देखते हुए निष्कर्ष स्वरूप कह सकते हैं कि भविष्य में चंद्रमा पर स्थायी अनुसंधान केंद्र, लूनर गेटवे अंतरिक्ष स्टेशन तथा मंगल ग्रह की मानव यात्राओं के लिए चंद्रमा को आधार बनाने की योजनाएँ बनाई जा रही हैं, साथ ही चंद्र ध्रुवों पर जल-बर्फ की उपस्थिति भविष्य में मानव बस्तियों और अंतरिक्ष अभियानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा सकती हैं इसके साथ ही चांद पर उपस्थित हीलियम-3 भविष्य के ईंधन जैसे संभावित संसाधनों के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान और भी ज़रूरी हैं।
क्या हैं चंद्रमा से जुड़े कुछ रोचक वैज्ञानिक तथ्य
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि चंद्रमा,पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है और अब तक 12 मनुष्य (अंतरिक्ष यात्री) चंद्रमा की सतह पर चल चुके हैं और सभी अपोलो कार्यक्रम (1969–1972) के दौरान गए थे। साथ ही विश्व वैज्ञानिक अनुसंधानों से चंद्रमा की आयु लगभग 4.5 अरब वर्ष मानी जाती है। अगर पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी की बात करें तो पाते हैं कि पृथ्वी से चंद्रमा औसतन लगभग 3,84,400 किलोमीटर दूर है, (जोकि दूर बिंदु पर बढ़ती एवं पास के बिंदु पर आने पर घटती भी है जिन्हें अपोजी एवं पेरिगी कहा जाता है) और चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी का लगभग एक-छठा है,सामान्य भाषा में इसका मतलब हुआ कि यदि आपका भार पृथ्वी पर 60 किलोग्राम है तो चन्द्रमा पर आपको अपना भार लगभग 10 किलोग्राम ही महसूस होगा, या फिर कुछ यूं कहें पृथ्वी पर 60 किलोग्राम द्रव्यमान वाला व्यक्ति चंद्रमा पर भी 60 किलोग्राम द्रव्यमान ही रखेगा, लेकिन उसका भार पृथ्वी की तुलना में लगभग एक-छठा होगा। यह भी जानना आवश्यक है कि चंद्रमा, पृथ्वी की ओर हमेशा अपना लगभग एक ही भाग दिखाता है क्योंकि वह ज्वारीय रूप से पृथ्वी के साथ समकालिक है। आपको यह भी जानना चाहिए कि ध्रुवीय क्षेत्रों के स्थायी छायादार क्रेटरों में जल-बर्फ की उपस्थिति के मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण भी मिले हैं, साथ ही हम यह भी जान चुके हैं कि चंद्रमा पर लगभग कोई घना वायुमंडल नहीं है, इसलिए वहाँ दिन और रात के तापमान में अत्यधिक अंतर होता है और चंद्रमा पर एक दिन वाले भाग ( चन्द्रमा पर सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त) तक की अवधि लगभग पृथ्वी के 14 दिनों के बराबर होती है और साथ ही चंद्रमा प्रति वर्ष लगभग 1.5 इंच पृथ्वी से दूर भी होता जा रहा है तो आप स्वयं भी सोच सकते हैं कि क्या होगा अति दूर भविष्य में और ऐसी ही दूरी को सटीक प्रमाणित मापने के लिए उसी अपोलो 11 मिशन के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों द्वारा लूनर लेज़र रेंजिंग रेट्रोरिफ्लेक्टर (चंद्र लेज़र दूरी-मापन प्रतिपरावर्तक) चंद्रमा की सतह पर लगाया गया एक विशेष प्रकाश-परावर्तक उपकरण है, जिसकी सहायता से पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी अत्यंत सटीकता से मापी जाती है उसको भी स्थापित किया था, जिसका उपयोग आज भी पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी मापने में किया जाता है।
है न कमाल का अपना चंदा मामा।
अंतर्राष्ट्रीय चंद्र दिवस कैसे मनाएँ?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने इस पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि इस दिवस पर आपके द्वारा विज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के अनेक सार्थक प्रयास किए जा सकते हैं,जैसे कि उनमें से कुछ निम्न प्रकार हो सकते हैं।
1-दूरबीन या टेलीस्कोप से चंद्रमा का अवलोकन करें, अगर आपके पास कोई टेलीस्कोप/दूरबीन या विनोकुलर आदि उपकरण भी नहीं है तो भी चन्द्रमा का साधारण आँखों से ही लुत्फ़ उठा ही सकते हैं।
2- स्कूल,कॉलेज, इंस्टिट्यूट एवं विद्यालयों और महाविद्यालयों में अंतरिक्ष विज्ञान विषयक व्याख्यान,चंद्र मॉडल, रॉकेट आदि एवं विज्ञान प्रदर्शनी और प्रश्नोत्तरी आयोजित करके चंद्र जिज्ञासा बड़ा सकते हैं।
3-बच्चों को अपोलो मिशन, चंद्रयान और दुनियां के साथ ही विशेषकर भारतीय वैज्ञानिकों की भी प्रेरक कहानियाँ सुनाएँ जिस से ख़ुद के साथ ही दूसरों को भी चन्द्रमा से रूबरू करवाते हुए ही अंतरिक्ष की अथाह गहराईयों से जोड़ सकते हैं।
4-चंद्रमा की फोटोग्राफी और खगोलीय अवलोकन का अभ्यास कर सकते हैं।
5- अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़ी तमाम पुस्तकों, जैसे कि, कण कण में विज्ञान, माइंड्स डेट शेप्ड द वर्ल्ड और भारतीय विज्ञान के नक्षत्र दीप आदि एवं वृत्तचित्रों और तमाम वैज्ञानिक लेखों का भी अध्ययन कर सकते हैं।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय चंद्र दिवस संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त एक वैश्विक उत्सव है जो प्रतिवर्ष 20 जुलाई को 1969 में अपोलो 11 के चंद्र आगमन की स्मृति में मनाया जाता है एवं यह अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है, सतत चंद्र अन्वेषण के बारे में जागरूकता बढ़ाता है और अंतरिक्ष विज्ञान में मानवता की उपलब्धियों का जश्न मनाता है साथ ही 20 जुलाई 2026 का वैश्विक उत्सव, नील आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन द्वारा चंद्रमा की सतह पर पहली बार कदम रखने के ऐतिहासिक दिन की 57वीं वर्षगांठ को चिह्नित करता है। साथ ही अंतर्राष्ट्रीय चंद्र दिवस केवल एक ऐतिहासिक घटना की वर्षगांठ भर ही नहीं है बल्कि मानव जिज्ञासा, वैज्ञानिक सोच, नवाचार और वैश्विक सहयोग का उत्सव है, यही कारण है कि नासा के अपोलो-11 से लेकर भारत के चंद्रयान-3 तक और भविष्य के तमाम चंद्र अभियानों तक की यात्राएँ यह समझाने में सक्षम हैं कि अंतरिक्ष अन्वेषण अब केवल महाशक्तियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी मानवता की साझा वैज्ञानिक यात्रा बन चुका है ,आज जब विश्व, चंद्रमा पर स्थायी वैज्ञानिक उपस्थिति स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और भारत अपने सफल चंद्र अभियानों से वैश्विक नेतृत्व की भूमिका में अग्रणी हो सकता है, तब अंतर्राष्ट्रीय चंद्र दिवस हमें यह संदेश देता है कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती और चंद्रमा तक पहुँचना मानव उपलब्धि का अंत नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में नई संभावनाओं, नई खोजों और नए भविष्य की शुरुआत है।
🙏🙏 सादर।🙏🙏
धन्यवाद।
नोट - किन्हीं भी विशेष खगोलीय घटनाओं से संबंधित जानकारियों हेतु निःशुल्क 24×7 सम्पर्क सूत्र।
© खगोलविद अमर पाल सिंह।
एस्ट्रोनॉमी एजुकेटर,वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला (तारामण्डल) गोरखपुर, उत्तर प्रदेश,भारत।
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