उन्नत रेलवे इंजीनियरिंग में बढ़ती स्वदेशी क्षमताओं का प्रमाण है देश की पहली डाइड्रोजन ट्रेन


नयी दिल्ली 16 जुलाई (वार्ता) हरियाणा में उत्तर रेलवे के जींद-सोनीपत रेल खंड पर चलने वाली हाइड्रोजन ट्रेन उन्नत रेलवे इंजीनियरिंग में देश की बढ़ती क्षमताओं का प्रमाण है।

रेलवे के अनुसार यह ट्रेन स्वदेशी तकनीक का उपयोग करके विकसित की गयी है। भारत में ही डिजाइन, इंजीनियरिंग और एकीकृत की गयी यह ट्रेन उन्नत रेलवे इंजीनियरिंग में देश की बढ़ती क्षमताओं को दर्शाती है।
रेलवे बताया है कि देश की पहली हाइड्रोजन फ्यूल सेल से चलने वाली इस ट्रेन का विकास भारतीय रेलवे के नेतृत्व में हुआ है। अनुसंधान अभिकल्प एवं मानक संगठन (आरडीएसओ) ने इसकी तकनीकी विशिष्टताओं को तैयार किया और डिज़ाइन अनुमोदन प्रक्रिया का नेतृत्व किया। ट्रेन का एकीकरण मेसर्स मेधा सर्वो ड्राइव्स द्वारा किया गया है, जबकि इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (आईसीएफ) ने ट्रेन की थीम और बाहरी डिज़ाइन में योगदान दिया है।
रेलवे के अनुसार इस परियोजना के हर स्तर पर सुरक्षा को समाहित किया गया है। ट्रेन और हाइड्रोजन भंडारण सिलेंडरों के डिजाइन से लेकर ईंधन भरने के बुनियादी ढांचे, निगरानी सॉफ्टवेयर और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणालियों तक हर चरण में सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा गया है। किसी एक सुरक्षा उपाय पर निर्भर रहने के बजाय भारतीय रेलवे ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत 'गहन सुरक्षा' के सिद्धांत को अपनाया है, जिसके तहत कई स्वतंत्र सुरक्षा प्रणालियां हाइड्रोजन भंडारण, स्थानांतरण और उपयोग के हर चरण की लगातार निगरानी, सत्यापन और सुरक्षा करती हैं।
रेलवे के अनुसार हर जगह निगरानी की व्यवस्था है। ट्रेन और संयंत्र में ऐसे उपकरण लगे हैं जो लगातार हाइड्रोजन रिसाव, असामान्य गर्मी, आग की लपटों या धुएं पर नज़र रखते हैं, इसलिए कोई भी समस्या कुछ ही सेकंड में पकड़ में आ जाती है। इसके अलावा, निरंतर वेंटिलेशन से ट्रेन में हवा का प्रवाह बना रहता है, ताकि अगर थोड़ी सी भी हाइड्रोजन लीक हो जाये, तो वह कहीं जमा होने के बजाय सुरक्षित रूप से बाहर निकलकर खुली हवा में घुल जाये।
रेलवे ने बताया है कि इसमें एक स्वचालित शट-ऑफ प्रणाली भी है। यदि कोई असामान्य स्थिति पायी जाती है, तो प्रणाली किसी व्यक्ति की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किए बिना स्वचालित रूप से हाइड्रोजन की आपूर्ति बंद कर सकती है। लोको पायलट की सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। लोको पायलट के केबिन को विशेष रूप से लोको पायलट की सुरक्षा के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिसमें एक विशेष मोड है जो आपातस्थिति में ट्रेन को सुरक्षित स्थान पर ले जाने की अनुमति देता है, और एक स्क्रीन है जो लोको पायलट को हर समय पूरे सिस्टम की वास्तविक स्थिति दिखाती है।
रेलवे ने बताया है कि जिंद हाइड्रोजन संयंत्र में भी इसी तरह की सुरक्षा व्यवस्थाएं हैं, जिनमें रिसाव का पता लगाने वाले उपकरण, आग का पता लगाने वाले उपकरण, स्वचालित शटडाउन सिस्टम, आग पर काबू पाने के लिए पानी के छिड़काव और अग्नि अलार्म शामिल हैं, जो सभी मिलकर काम करते हैं।
रेलवे के अनुसार हाइड्रोजन प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानकों, जैसे कि एनएफपीए-2 और आईएसओ 19880 श्रृंखला, के अनुसार डिज़ाइन किया गया है, साथ ही यह पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (पीईएसओ) की वैधानिक आवश्यकताओं का भी अनुपालन करती है। चालू करने से पहले, संपूर्ण प्रणाली का जर्मनी स्थित टीयूवी एसयूडी द्वारा एक स्वतंत्र तृतीय-पक्ष सुरक्षा मूल्यांकन किया गया, जो विश्व की अग्रणी तकनीकी निरीक्षण और प्रमाणन एजेंसियों में से एक है।
रेलवे ने बताया है कि इस ट्रेन को चलाने की अनुमति मिलने से पहले, यह सुनिश्चित करने के लिए कई कठिन परीक्षणों से गुज़ारा गया कि सब कुछ ठीक से काम कर रहा है। लोड बॉक्स परीक्षण में यह जांचा गया कि विद्युत और ऊर्जा प्रणाली वास्तविक भार के तहत सही ढंग से काम करते हैं। रेडियो फ्रीक्वेंसी परीक्षणों से यह सुनिश्चित किया गया कि ट्रेन के इलेक्ट्रॉनिक्स अन्य सिग्नलिंग और संचार प्रणालियों में बाधा न डालें। दोलन परीक्षणों से यह जांचा गया कि ट्रेन बिना अत्यधिक कंपन के, गति पर सुचारू और स्थिर रूप से चलती है। आपातकालीन ब्रेक दूरी परीक्षणों से यह पुष्टि की गयी कि आपातस्थिति में ट्रेन कितनी जल्दी और सुरक्षित रूप से रुक सकती है। इन सभी मूल्यांकनों, वैधानिक निरीक्षणों और स्वतंत्र सुरक्षा आकलनों को सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद ही परियोजना को परिचालन के लिए तैयार माना गया।

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