यूपी में कानून का राज नहीं, दोषी आईपीएस पर दर्ज हो धारा 307 का मुकदमा: अखिलेश यादव


अमरोहा, 30 अगस्त (वार्ता) उत्तर प्रदेश में कानून का राज पूरी तरह समाप्त हो चुका है यदि वास्तव में प्रदेश में कानून का राज होता तो अब तक दोषी आईपीएस अधिकारी के खिलाफ धारा 307 का मुकदमा दर्ज हो चुका होता, वैसे वह अधिकारी पद पर रहने लायक ही नहीं है। यह तीखा हमला समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मेरठ के थप्पड़ कांड और पुलिस बर्बरता के शिकार किसान नेता डॉ. दिग्विजय भाटी व मोहित जाटव से लखनऊ स्थित सपा कार्यालय में मुलाकात के दौरान बोला। मामले में रविवार को नया मोड़ आ गया जब पीड़ितों ने लखनऊ पहुंचकर समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अखिलेश यादव से मुलाकात की और अमरोहा से लेकर मेरठ तक के पूरे घटनाक्रम की जानकारी देकर न्याय की गुहार लगाई।अपनी आंख में आई गंभीर चोट और पुलिसकर्मियों द्वारा खींचकर ले जाने की घटना की आपबीती सुनाई, जिसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोपी पुलिस अधिकारियों पर जानलेवा हमले का मामला दर्ज करने और सख्त कार्रवाई की मांग उठाई।

अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि पीड़ितों को न्याय पाने के लिए इस तरह दर-दर भटकना पड़ रहा है, जो बेहद शर्मनाक है। उन्होंने आरोप लगाया कि पीड़ितों की सामाजिक जातिगत पृष्ठभूमि सामने आने के बाद पुलिस अधिकारियों का रवैया और अधिक अपमानजक हो गया। सपा अध्यक्ष ने दोनों पीड़ित किसान नेताओं को न्यायालय के समक्ष अपनी बात रखने और मजबूती से कानूनी लड़ाई लड़ने का परामर्श दिया। उन्होंने आश्वासन दिया कि प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने पर पीडीए के पीड़ित डॉ. दिग्विजय भाटी और मोहित जाटव को पूरा न्याय और सम्मान दिलाया जाएगा।
यह पूरा मामला अमरोहा के हसनपुर में किसान आंदोलनों को लेकर दर्ज मुकदमों से शुरू होकर मेरठ में ललिता गौतम हत्याकांड के विरोध-प्रदर्शन के दौरान और तूल पकड़ गया। प्रदर्शन के दौरान तत्कालीन एसएसपी अविनाश पाण्डेय से जुड़े घटनाक्रम के बाद पुलिसकर्मियों पर डॉ. दिग्विजय भाटी और मोहित जाटव के साथ बेरहमी से मारपीट करने के आरोप लगे।
घटना में सबसे बड़ा विवाद मेरठ एसएसपी कार्यालय के सीसीटीवी फुटेज को लेकर खड़ा हो गया है। 19 अगस्त की घटना के समय चार पुलिसकर्मी दोनों नेताओं को खींचकर ले गए थे, लेकिन उन पुलिसकर्मियों की पहचान और सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक नहीं किए जा रहे हैं। पीड़ितों का कहना है कि घटना की निष्पक्ष जांच के लिए फुटेज अहम साक्ष्य हैं, इसलिए इसकी स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए। समुचित मेडिकल परीक्षण और अभिलेखों में स्पष्टता न होने के चलते पीड़ितों ने अब अदालत का दरवाजा खटखटाने और न्याय मिलने तक अपनी लड़ाई जारी रखने का फैसला किया है।

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