प्राण.प्रतिष्ठा बगैर देवता की मूर्ति न्यायिक व्यक्ति नहीं बन पाती : उच्च न्यायालय


प्रयागराज, (दिनेश तिवारी) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भगवान श्रीराम चंद्र विराजमान की ओर से दाखिल एक द्वितीय अपील  खारिज कर दी है।

       न्यायमूर्ति अनिल कुमार.दशम की एकल पीठ ने मिर्जापुर की एक विवादित संपत्ति से जुड़े इस मामले में साफ किया कि जब तक किसी देवता की मूर्ति की विधिवत प्राण.प्रतिष्ठा  नहीं होती, तब तक वह देवता कानूनी रूप से " न्यायिक व्यक्ति"  नहीं बनता और उसके नाम पर संपत्ति का स्वामित्व स्थापित नहीं हो सकता।

        यह विवाद मिर्जापुर स्थित कई गाटा संख्याओं की भूमि से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि वे खुद को भगवान राम की मूर्ति के " क्वेस्ट फ्रेंड " के तौर पर पेश करते हुए देवता की ओर से यह मुकदमा लड़ रहे हैं। उनके अनुसार,  स्वर्गीय केदार नाथ मिश्रा को यह भूमि 1947 में एक स्थायी पट्टे के तहत मिली थीए जिसका पूरा भुगतान स्वर्गीय कैलाश नाथ अग्रवाल ने किया था।

       17 अगस्त 1949 को केदार नाथ मिश्रा ने कैलाश नाथ अग्रवाल के पक्ष में एक दान.पत्र  निष्पादित किया। शर्त यह थी कि इस भूमि पर भगवान राम की मूर्ति स्थापित की जाएगीए संपत्ति की आय का निजी इस्तेमाल नहीं होगाए और न ही कोई इसका स्वामित्व बदल सकेगा। कैलाश नाथ अग्रवाल को सिर्फ " प्रबंधक  "  नियुक्त किया गया था।

      याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि अग्रवाल परिवार के उत्तराधिकारियों (प्रतिवादीगण) ने आपस में मिलकर इस संपत्ति का बंटवारा कर लिया और दान.पत्र की शर्तों के विपरीत जमीन के हिस्से बेच भी दिए। इसकी जानकारी 2011 में मिलने पर प्रशासन से शिकायत की गईए पर कार्रवाई न होने पर 2014 में सिविल वाद दाखिल किया गया।

       सिविल जज (जूनियर डिवीजन) मिर्जापुर ने मई 2024 में वाद खारिज कर दिया था, जिसे जिला न्यायाधीश, मिर्जापुर ने मार्च 2026 में अपील में बरकरार रखा। दोनों अदालतों ने पाया किरू. 1949 का दान.पत्र वास्तव में एक निजी उपहार.पत्र था, धार्मिक बंदोबस्त नहीं। संपत्ति पर आज तक कोई मंदिर नहीं बना और न ही कोई मूर्ति स्थापित हुई।अग्रवाल परिवार दशकों से इस पर काबिज रहाए राजस्व अभिलेखों में उनका नाम दर्ज रहा और उन्होंने इसे अपनी मिलकियत की तरह इस्तेमाल किया (1967) में कोल्ड स्टोरेज और मकान बनवाएए वर्ष 2000 से बिक्री भी कीद्ध। हस्तांतरण पर पूर्ण रोक लगाने वाली शर्त संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम की धारा 10 व 126 के तहत अमान्य  है।


याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि निचली अदालत ने ही उन्हें वाद दायर करने का अधिकार  होने की बात मानी थी, इसलिए वाद खारिज करना गलत था। उन्होंने 2022 में उच्च न्यायालय के ही एक पूर्व आदेश का हवाला दियाए जिसमें कहा गया था कि यह दान.पत्र एक वैध बंदोबस्त बनाता है।

     उच्च न्यायालय ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि वह पूर्व आदेश केवल यह तय करने के लिए था कि क्या वाद को शुरुआत में ही खारिज किया जाए और उसमें दान.पत्र की असली प्रकृति पर अंतिम फैसला नहीं दिया गया था।


अदालत ने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी बनाम श्री सोम नाथ दास ;2000द्ध मामले का हवाला देते हुए कहा कि हिंदू मूर्ति तभी " न्यायिक व्यक्ति" का दर्जा पाती है जब उसकी धार्मिक रीति.रिवाज के अनुसार प्राण.प्रतिष्ठा और स्थापना हो चुकी हो। चूंकि याचिकाकर्ताओं ने खुद स्वीकार किया कि मूर्ति कभी स्थापित ही नहीं हुई, इसलिए देवता के नाम पर स्वामित्व का दावा ही निराधार हो जाता है।

      अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ताओं ने प्रशासनिक अधिकारियों को संपत्ति का प्रबंधन संभालने का जो आदेश मांगा था, वह तभी दिया जा सकता था जब संबंधित अधिकारी मुकदमे में पक्षकार होते। चूंकि उन्हें पक्षकार नहीं बनाया गयाए यह अनिवार्य पक्षकार के अभाव  का मामला बना।

   अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए 14 प्रस्तावित श्विधि के सारवान प्रश्न दरअसल तथ्यों के पुनर्मूल्यांकन की मांग हैंए न कि कानून के किसी नए या अनसुलझे प्रश्न का मामला ।इसलिए धारा 100 सीपीसी के तहत द्वितीय अपील में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।


नतीजतन, उच्च न्यायालय ने दोनों निचली अदालतों के फैसलों को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। हालांकि कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की उस बात से असहमति जताई जिसमें याचिकाकर्ताओं का वाद दायर करने का अधिकार  मान लिया गया था । उच्च न्यायालय के अनुसार, जब कोई वैध बंदोबस्त सिद्ध ही नहीं हुआ, तो याचिकाकर्ताओं को यह अधिकार भी नहीं मिलता।

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