देवरिया की पूर्व डीएम दिव्या मित्तल ने दिया इस्तीफा


देवरिया,30 अगस्त (वार्ता) उत्तर प्रदेश की 2013 वैच की चर्चित आईएएस तथा देवरिया की पूर्व जिलाधिकारी दिव्या मित्तल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया हैं। मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उन्होंने एक पोस्ट के जरिए इसकी जानकारी दी।दिव्या मित्तल संतकबीरनगर, मिर्जापुर तथा देवरिया में जिलाधिकारी पद पर रहने के बाद देवरिया से वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश सरकार के राजस्व विभाग में विशेष सचिव के पद पर तैनात थीं। एक्स पर उन्होंने लिखा कि आज मैंने 13 वर्षों की अविस्मरणीय यात्रा को अपनी इच्छा से विराम देते हुए आईएएस से त्यागपत्र दे दिया है। साधारण परिवेश में पलते हुए मैंने एक अच्छे, सफल जीवन का सपना देखा था। दिन-रात एक कर आईआईटी दिल्ली और आईआईएम बैंगलोर से पढ़ने के बाद लंदन में नौकरी लग गयी पर सब कुछ पा लेने पर भी कुछ अधूरा था।
उन्होंने आगे अपने पोस्ट में लिखा कि अपने देश में न होना उन्हें खलता था। उनकी पढ़ाई, आत्मविश्वास और दुनिया में कहीं भी सिर उठाकर चलने की ताकत सब इस मिट्टी का कर्ज था। वो कर्ज चुकाना था। इसलिए वह लौट आईं और आईएएस अधिकारी बनने का सौभाग्य मिला। अपने पोस्ट में अपने कार्यकाल को याद करते हुए उन्होंने लिखा है कि देवरिया ने सिखाया कि सही के साथ खड़ा होना विकल्प नहीं, कर्तव्य है। मिर्जापुर ने सिखाया कि असंभव कोई तथ्य नहीं, बस एक राय है और माँ विंध्यवासिनी के चरणों में बैठकर सीखा कि शक्ति किसी पद से नहीं, उनकी कृपा और लोगों के विश्वास से आती है। उन्होंने लिखा है कि सेवा के दौरान जरूरतमंद परिवारों, दिव्यांगों और किसानों के लिए काम करते हुए यह महसूस किया कि हर सरकारी फाइल के पीछे एक इंसान होता है।
गौरतलब है कि दिव्या मित्तल मूल रूप से हरियाणा के रेवाड़ी की रहने वाली हैं। उन्होंने आईआईटी दिल्ली से बीटेक और आईआईएम बेंगलुरु से एमबीए किया है। एमबीए के बाद लंदन में लाखों के पैकेज पर नौकरी की और फिर उसे छोड़कर देश सेवा के लिए यूपीएससी की तैयारी की। 2012 में पहले प्रयास में आईपीएस बनीं और 2013 में दूसरे प्रयास में 68वीं रैंक के साथ आईएएस बनीं। मिर्जापुर में डीएम रहते हुए उन्होंने हलिया ब्लॉक के सुदूर पहाड़ी गांव लहुरियादह में आजादी के 75 साल बाद पहली बार नल से पानी पहुंचाकर खूब सुर्खियां बटोरी थीं। देवरिया में उनका कार्यकाल को लोग सम्मान के साथ याद करते हैं। देवरिया के कार्यकाल में उन्होंने जहां सरकारी योजनाओं को धरातल पर पहुंचाने का कार्य किया। वहीं उनके कड़े फैसलों को भी यहां की जनता उन्हें याद करती हैं।
उन्होंने अपने सहयोगियों, अधिकारियों और कर्मचारियों का भी आभार जताते हुए कहा कि उनकी पूरी यात्रा में इन सभी का बड़ा योगदान रहा।
पत्र के अंत में उन्होंने लिखा कि अब अमर से आंखें नहीं मिलेंगी लेकिन वह एक ईश्वर की तरह उनकी पहाड़ी को, जो एक वृद्ध मां जैसी है, जरूर देखेंगी। उन्होंने कहा कि पद छूट गया है, लेकिन स्पर्श जीवन भर नहीं छूटेगा और देश की मिट्टी ने जो सपना उन्हें दिया है, वह भी कभी नहीं छूटेगा। 

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