गवाहों के बयान की ऑडियो.वीडियो रिकॉर्डिंग जरूरी, आरोपी सास को जमानत
प्रयागराज ,18 सितम्बर (:) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आगरा के बसौनी थाना क्षेत्र के दहेज उत्पीड़न और दहेज हत्या से जुड़े मामले में आरोपी सास चंद्रकांता को जमानत दे दी।
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने कहा कि प्राथमिकी और धारा 180 के तहत दर्ज बयान में अंतर है और आवेदिका के खिलाफ आरोप सामान्य एवं अस्पष्ट हैं। न्यायालय ने यह भी पाया कि मृतका की मौत से पहले उसके साथ दहेज उत्पीड़न के संबंध में पर्याप्त प्रथमदृष्टया सामग्री सामने नहीं आई। चंद्रकांता 18 मई 2026 से जेल में थी।
सुनवाई के दौरान मामले के विवेचना अधिकारी, सहायक पुलिस आयुक्त, न्यायालय के सामने पेश हुए। उन्होंने स्वीकार किया कि प्रथम सूचनादाता का धारा 180 के तहत बयान दर्ज करते समय उसका ऑडियो.वीडियो रिकॉर्ड तैयार नहीं किया गया था।
न्यायालय ने इस पर डीजीपी के 21 जुलाई 2025 और 4 अगस्त 2026 के परिपत्रों का हवाला दिया। विवेचक इस बारे में संतोषजनक वजह नहीं बता सके और उन्होंने बिना शर्त माफी मांगी।
न्यायालय ने टिप्पणी की कि कई मामलों में जांच अधिकारी ऑडियो.वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं करते , जिससे बाद में यह आरोप न लगे कि गवाहों के बयान उन्होंने खुद एफआईआर की भाषा में तैयार कर दिए। अदालत ने जांच को निष्पक्ष और पारदर्शी रखने पर जोर दिया।
उच्च न्यायालय ने जांच अधिकारियों के लिए कई दिशा.निर्देश दिए कि सूचना मिलते ही विवेचक को घटनास्थल पहुंचना चाहिए और गवाहों के बयान बिना देरी दर्ज करने चाहिए। संभव हो तो ई.साक्ष्य ऐप के जरिए ऑडियो.वीडियो रिकॉर्डिंग की जाए और रिकॉर्डिंग को अदालत के सामने उपलब्ध कराया जाए।
न्यायालय ने केवल शिकायतकर्ता पक्ष के लोगों के बजाय स्वतंत्र गवाहों के बयान भी दर्ज करने पर जोर दिया। दुष्कर्म और यौन अपराधों में पीड़िता का बयान महिला पुलिस अधिकारी द्वारा उसके निवास या उसकी सुविधा के स्थान पर दर्ज करने को कहा गया।
न्यायालय ने कहा कि जिन अपराधों में 10 वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है, उनमें गवाहों को बयान के लिए मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाए। अश्लील वीडियो से जुड़े मामलों में आरोपी का मोबाइल फोन जब्त कर फोरेंसिक जांच के लिए भेजने और जरूरत के मुताबिक कॉल डिटेल रिकॉर्ड जुटाने के निर्देश भी दिए गए।
आवश्यक मामलों में पहचान परेड कराने और बरामद संपत्ति की कानून के अनुसार पहचान सुनिश्चित करने पर भी अदालत ने जोर दिया।
उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के डीजीपी को निर्देश दिया कि ठछैै की धारा 180 के तहत दर्ज होने वाले बयानों की ऑडियो.वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने पर विचार करें। कोर्ट के मुताबिक इससे आपराधिक जांच में पारदर्शिता और निष्पक्षता बढ़ेगी और जमानत समेत न्यायिक कार्यवाही में भी अदालत को मदद मिलेगी।
ऑडियो.वीडियो माध्यम से बयान दर्ज करने की अनुमति देती है। डीजीपी के मौजूदा निर्देशों में दुष्कर्म पीड़िताओं के बयान की रिकॉर्डिंग अनिवार्य की गई है, जबकि अन्य बयानों के लिए यह व्यवस्था वैकल्पिक रही है। उच्च न्यायालय ने अब सभी बयानों के लिए इसे अनिवार्य करने पर विचार करने को कहा है।
न्यायालय ने चंद्रकांता को जमानत देते हुए शर्त रखी कि वह गवाहों को प्रभावित नहीं करेंगीए जांच में सहयोग करेंगी और किसी अपराध में संलिप्त नहीं होंगी। उन्हें व्यक्तिगत बॉन्ड और दो जमानतदारों पर रिहा करने का आदेश दिया गया। कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति अनुपालन के लिए उत्तर प्रदेश के डीजीपी को भेजने का भी निर्देश दिया।

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