हम सीट मांगने वाली नहीं, जीत दिलाने वाली पार्टी हैं: संजहम सीट मांगने वाली नहीं, जीत दिलाने वाली पार्टी हैं: संजय निषाद


प्रयागराज ,(दिनेश तिवारी) प्रदेश मि सत्तारूढ़ सरकार में में मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाने आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कहा कि उनकी पार्टी केवल सीटें मांगने वाली सहयोगी नहीं है, बल्कि उन सीटों पर जीत दिलाने की क्षमता रखती है जहां भाजपा लंबे समय से कम वोटों के अंतर से हारती रही है।

       प्रयागराज सर्किट हाउस में शनिवार को आयोजित प्रेस वार्ता में संजय निषाद ने कहा कि उनकी पार्टी का सिद्धांत है,  "जहां कम , वहां हम। " उनका कहना था कि जिन सीटों पर भाजपा मामूली अंतर से हारती है, वहां सहयोगी दल उस कमी को पूरा कर जीत सुनिश्चित कर सकते हैं।

       मंत्री ने कहा कि जिन क्षेत्रों में निषाद समाज की संख्या अधिक है और भाजपा जहां से लाहभग चार दशक  से जीत हासिल नहीं कर पाई है, उन सीटों पर निषाद पार्टी को चुनाव लड़ने का अवसर मिलना चाहिए।

        निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने निषाद पार्टी को 16 सीटें दी थीं, जिनमें से 11 पर जीत मिली थी। इसी प्रदर्शन के आधार पर उनकी पार्टी उन सीटों पर दावा कर रही है जहां निषाद समाज का प्रभाव अधिक है और भाजपा को लंबे समय से सफलता नहीं मिली है।

         भाजपा के यूपी प्रभारी विनोद तावड़े से मुलाकात को लेकर पूछे गए सवाल पर कहा, उनके बीच राजनीतिक चर्चा नहीं हुई। उन्होंने अपने घर चाय पर आने का निमंत्रण दिया था और इसी क्रम में वह उनके घर आए। मुलाकात में सामाजिक विषयों पर चर्चा हुई।

               राजनीतिक मुद्दों पर विस्तार से बातचीत के लिए दिल्ली और लखनऊ में समय लेकर बैठक करने की बात हुई है। उन्होंने कहा कि जिन मुद्दों को उन्होंने उठाया, उन्हें लिखकर भी दिया गया और तावड़े ने उसे नोट भी किया।

          सीट बंटवारे को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, उनकी पार्टी को केवल सीट मांगने वाली पार्टी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उनकी कोशिश उन सीटों पर जीत दिलाने की है, जहां भाजपा लंबे समय से कमजोर प्रदर्शन करती रही है।

 उन्होंने कहा कि अगर किसी सीट पर भाजपा कम वोटों से हार रही है और वहां निषाद समाज की संख्या पर्याप्त हैए तो उस सीट पर निषाद पार्टी को चुनाव लड़ने का अवसर दिया जाना चाहिए।

     उन्होंने  एक अन्य सवाल के जवाब में कहा, लंबे समय तक जातियां राजनीतिक रूप से निष्क्रिय रहीं, लेकिन अब वे अपने हितों को लेकर ज्यादा जागरूक हैं। पहले चुनाव के दौरान अलग-अलग तरीकों से वोट हासिल किए जाते थे, लेकिन अब इन समुदायों ने अपनी राजनीतिक पार्टियां बनानी शुरू कर दी हैं। उन्होंने कहा कि समाज अब अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी को लेकर सवाल कर रहा है।

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