हृष्ट.पुष्ट पति को पत्नी का भरण.पोषण करना ही होगा, बेरोजगारी का बहाना नहीं चलेगा
प्रयागराज,(दिनेश तिवारी) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि शारीरिक रूप से हृष्ट.पुष्ट और काम करने में सक्षम पति बेरोजगारी का बहाना बनाकर पत्नी के भरण.पोषण की जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।
पत्नी की जिम्मेदारी पति की है और वह उसे जीवनयापन के लिए दर.दर भटकने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। कोर्ट ने कासगंज परिवार न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पत्नी को आवेदन की तारीख से 3,500 रुपये प्रतिमाह भरण.पोषण देने का निर्देश दिया गया था।
न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की एकल पीठ ने कासगंज परिवार न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए यह टिप्पडी की। परिवार न्यायालय ने पत्नी को आवेदन की तारीख से 3,500 रुपये प्रतिमाह भरण.पोषण देने का आदेश दिया था।
इसके खिलाफ पति ने पुनरीक्षण याचिका दाखिल कर दलील दी कि पत्नी अपनी मर्जी से मायके में रह रही है। वह बेरोजगार है और उसकी कोई स्थायी आय नहीं है। पति ने यह भी कहा कि वह इतनी राशि देने की स्थिति में नहीं है।
न्यायालय ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। कहा कि भरण.पोषण का उद्देश्य ऐसी महिला को आर्थिक सहारा देना है, जिसे वैवाहिक घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है। पति अपनी जिम्मेदारी से यह कहकर नहीं बच सकता कि उसके पास नौकरी नहीं है या कारोबार अच्छा नहीं चल रहा, जबकि वह काम करने में सक्षम है।
न्यायालय ने रिकॉर्ड के आधार पर पाया कि पत्नी की अपनी कोई स्वतंत्र आय नहीं थी। दहेज की मांग पूरी न होने पर उसे वैवाहिक घर से निकाल दिया गया था। ऐसी स्थिति में पत्नी का भरण.पोषण करना पति का दायित्व है।
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