पितरों के तर्पण में काले तिल का सर्वाधिक महत्व

 


गोरखपुर 03 अक्टूबर (वार्ता) श्राद्ध एक हिंदू अनुष्ठान है जो पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किया जाता है। इसमें पितरों को पिण्डदान ;भोजन अर्पित करना और तर्पण ;जल अर्पित करनाद्ध शामिल होता है। श्राद्ध जो ..श्रद्धा.. शब्द से बना है, पितृपक्ष के दौरान या किसी पूर्वज की मृत्यु तिथि पर किया जाता है। पितरों को तृप्त करने के लिए काले तिल, अक्षत् मिश्रित गंगा जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहा जाता है। तर्पण में काला तिल और कुश का बहुत महत्व होता है।

शास्त्रों में वर्णित विधि विधान का ना केवल धार्मिक बल्कि वैज्ञानिक महत्व भी हैं। पितृ पक्ष में किये जाने वाले अनुष्ठान भी ऐसे ही हैं लगभग सभी अवसरों पर किये जाने वाले हवन और तर्पण की सामग्रियां ना केवल वातावरण को शुद्ध करती हैं बल्कि स्वास्थ्य को भी पुष्ट करती हैं!
पितरों के तर्पण में तिल, चावल, जौ आदि को अधिक महत्त्व दिया जाता है। श्राद्ध में तिल और कुशा का सर्वाधिक महत्त्व होता है। श्राद्ध के दौरान तर्पण करने वालों को पितृकर्म में काले तिल के साथ कुशा का उपयोग महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि तर्पण के दौरान काले तिल से पिंडदान करने से मृतक को बैकुंठ की प्राप्ति होती है। इसलिए श्राद्ध कार्य में इसका होना बहुत जरूरी होता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि काला तिल भगवान विष्णु का प्रिय है और यह देव अन्न है। इसलिए पितरों को भी तिल प्रिय है। इसलिए काले तिल से ही श्राद्धकर्म करने का विधान है। अथर्ववेद के अनुसार तिल तीन प्रकार के श्वेत, भूरा और काला जो क्रमश देवता, ऋषि एवं पितरों को तृप्त करने वाला माना गया है। मान्यता है कि बिना तिल श्राद्ध किया जाएए तो दुष्ट आत्माएं प्रभावी होकर ग्रहण कर लेती हैं।
भगवान राम की नगरी अयोध्या धाम के ज्योतिषाचार्ण्य आचार्य शत्रुघ्न मिश्र ने शास्त्रों का हवाला देते हुए शनिवार को यूनीवार्ता से बातचीत में कहा कि पितृपक्ष में किये जाने वाले तर्पण में तिल व कुशा का विशेष महत्व है। वायु पुराण के अनुसार तिल और कुशा के साथ श्रद्धा से जो कुछ पितरों को अर्पित किया जाता है वह अमृत रूप मे उन्हे प्राप्त होता है। पितर किसी भी योनि में हों उन्हें वह सब उसी रूप में प्राप्त होता है।
श्री मिश्र ने बताया कि अर्यमा देव को पितरों का देव कहा जाता है और पितृ पक्ष में उनकी पूजा की जाती है। ऐसे में उनकी पूजा के दौरान अर्यमा देव को काला तिल अर्पित किया जाता है । ऐसा करने से अर्यमा देव के साथ.साथ पितृ भी प्रसन्न होने के साथ ही परिजनों को सुख.समृद्धि का आशीर्वाद देकर अपने लोक को चले जाते है !
उन्होने बताया कि पितृपक्ष के दौरान पितरों की सद्गति के लिए पिण्डदान और तर्पण के लिए काले तिल और कुश पितृपक्ष में श्राद्ध के हर कर्म में काले तिल का प्रयोग अनिवार्य माना गया है। अगर कोई व्यक्ति और कुछ दान न कर पाए तो कम से कम काले तिल जरूर दान करना चाहिए। इससे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन की मुश्किलें कम होने लगती हैं। माना जाता है कि काले तिल का दान करने से पूर्वज हमारी रक्षा करते हैं। श्री शुक्ल ने बताया कि माता के लिए नवमी और पिता के लिए अमावस्या को पिंडदान और तर्पण करना चाहिए !
श्री मिश्र ने बताया शास्त्रों में तीन प्रकार के ऋण बताए गये हैं। देव ऋण, ऋशि ऋण और पितृ ऋण हैं। शास्त्रों के अनुसार हमारे पूर्वज पितृपक्ष में धरती पर निवास करते हैं। पितृ ऋण उतारने के लिए ही पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म किया जाता है। पित्रपक्ष के दौरान अपने पूर्वजों के निधन की तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाता है। जो परिजन अपने पूर्वजों का पिण्डदान नहीं करते उन्हे पितृ ऋण और पिततृदोष के कोपभाजन का शिकार होना पड़ता है।
पिंडदान के पूर्व मुंडन करने के विधान को महत्वपूर्ण बताया गया है। धर्म शास्त्रों में कहा गया है ..कोई भी धार्मिक कृत्य करने से पहले मुंडन कराया जाता है।
आचार्य ने बताया कि वैसे तो तिल चाहे सफेद हों या काले दोनों ही स्वास्थ्य के लिए अच्छे माने जाते हैं मगर धार्मिक कार्यों मे काले तिल का ही उपयोग किया जाता है। काले तिल को आप खा भी सकते हैं। काले तिल बालों के लिए भी बहुत फायदेमंद माने जाते हैं। काले तिल में पॉलीअनसैचुरेटेड फैट्स और भरपूर एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। काले तिल खाने से खराब कोलेस्ट्रॉल को कम किया जा सकता है। हार्ट के लिए भी काला तिल लाभदायक होता है। प्राकृतिक रूप से उपलब्ध और शास्त्रोक्त हवन.तर्पण सामग्रियां पुरखों और वंशजों को पुण्य लाभ देती ही हैं, बदलते मौसम में हमारे स्वास्थ्य का ध्यान भी रखती हैं।

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